Thursday, July 26, 2012
नरेन्द्र मोदी से नई दुनिया के संपादक शाहिद सिद्दीकी का इंटरव्यू
शाहिद सिद्दीकी: नरेन्द्र मोदी जी, हिंदुस्तान का आपकी कल्पना क्या है? क्या आप हिंदुस्तान को एक हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं? अगले पचास वर्षों में आप कैसा हिंदुस्तान बनाना चाहते हैं?
नरेन्द्र मोदी: हम एक खुशहाल भारत देखना चाहते हैं। एक मजबूत भारत देखना चाहते हैं। 21वीं सदी भारत की सदी हो यह हमारा स्वप्न है। जिसे साकार करना है।
सिद्दीकी: कहा जाता है कि आप गुजरात को हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर आप केंद्र में सत्तारूढ़ हो गए तो आप भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना चाहेंगे। इसमें मुसलमानों और दूसरी अल्पसंख्यकों की कैसी जगह होगी?
मोदी: पहली बात तो यह है कि आज गुजरात में अल्पसंख्यकों की जो जगह है वह पूरे देश की तुलना में ज्यादा अच्छी है। और दूसरे बेहतर होने की गुंजाइश इतनी ही है जितनी किसी हिंदू की। मुसलमान को भी आगे बढ़ने का उतना ही मौका मिलना चाहिए। जितना किसी हिंदू को। अगर तशब हो तो एक घर भी नहीं चल सकता। एक बहु अच्छी लगे और दूसरी न लगे तो घर में सुकून नहीं हो सकता।
सिद्दीकी: मान लीजिए की घर में चार बच्चे हैं। इनमें से एक किसी भी वजह से कमजोर है, पिछड़ गया है तो क्या उसपर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए? उसे बढ़ने के लिए अधिक अवसर नहीं मिलने चाहिए?
मोदी: यह तो हमारे संविधान में भी कहा है कि जो कमजोर है, पिछड़ा है, उसे अलग से सहारा मिलना चाहिए। अगर समाज इसकी जिम्मेवारी नहीं उठाएगा तो भला कौन उठाएगा? मान लीजिए कि एक बच्चा
मानसिक रूप से कमजोर है इसके मां-बाप की जिंदगी तो उसे पालने में खप गई। मेरा मानना है कि अगर कमजोर बच्चा है तो उसकी जिम्मेवारी सिर्फ माता-पिता की नहीं बल्कि पूरे समाज की है। अगर हम यह कहें कि यह तुम्हारे घर में पैदा हुआ है सिर्फ तुम इसे संभाल लो तो गलत होगा।
आरक्षण
सिद्दीकी: इस मुल्क में जितने भी सर्वे हुए हैं। चाहे वह सच्चर कमेटी हो या रंगनाथ मशि्र कमीशन। सबका कहना है कि खासतौर से मुसलमान जीवन के हर क्षेत्र में चाहे वह शिक्षा हो या आर्थिक बहुत से कारणों से पिछड़ गए हैं। आपके विचार में उन्हें आगे लाने के लिए, उनका हक दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए? क्या उन्हें आरक्षण नहीं मिलना चाहिए? जबकि 50 फिसदी नौकरियां आरक्षण में चली गई हैं। बाकी 50 प्रतशित में मुसलमान मुकाबले में पीछे रह जाता है। उसके लिए सभी दरवाजे बंद हैं। उसको आगे लाने के लिए क्या करना चाहिए?
मोदी: ऐसा नहीं है। गुजरात में ओबीसी में 36 मुस्लिम बिरादरियां हैं जो पिछड़ों में आती हैं। उन्हें वे सभी सुविधाएं मिलती हैं जो दूसरे पिछड़ों को मिलती हैं। मैं भी पिछड़ी जाती से हूं। हमें रास्ता ढूंढना होगा कि 3 सबको इसमें हिस्सेदारी मिले। जैसे आज स्कूल हैं, टीचर हैं। इसके बावजूद लोग अनपढ़ हैं। इसका हल हमने गुजरात में ढूंढा। हमने यह अभियान चलाया कि शत प्रतशित लड़कियों को शिक्षा मिले। जून के महीने में जब बहुत गर्मी होती है तो सारे अधिकारी, सारे मंत्री, सारी सरकार गांव-गांव और घर-घर जाते हैं। ये देखते हैं कि क्या लड़कियां पढ़ रही हैं आज 99 प्रतशित लड़कियां स्कूलों में हैं। इनमें सभी धर्मों की लड़कियां हैं। पहले ड्राँप आउट 40 प्रतशित था। आज वह मुि’कल से 2 प्रतशित ही रह गया है। अब इसका फायदा किसको मिल रहा है? मेरी हिंदू मुसलमान की फिलाँस्फी नहीं है। मैं तो सिर्फ यह देखता हूं कि गुजरात में रहने वाले हर बच्चे को हक मिले। मेरी दस साल की कोशिशों में सबसे खूशी इस बात की है कि मैं किसी हिंदू स्कूल में अभिभावकों की बैठक बुलाता हूं तो उसमें साठ प्रतशित आते हैं। जबकि मुसलमान क्षेत्रों की बैठकों में शत-प्रतशित लोग आते हैं।
मुसलमान ज्यादा जाग रहे हैं
सिद्दीकी: आपने मुसलमानों के इलाकों के स्कूलों में जाकर ऐसी मिटिंगें की है।
मोदी: बिल्कुल, ढेर सारी। बल्कि मेरा तजुर्बा यह है कि आज शिक्षा के बारे में मुसलमान ज्यादा जागे हुए हैं। अभी मैं आपको बताऊं कि दान्ता के पास एक गांव में मैं गया। वह 70 प्रतशित मुस्लिम आबादी का था। वहां तीन बच्चियों ने मुझसे कहा कि उन्हें मुझसे अलग से बात करनी है। मुझे नहीं पता था कि वे किस धर्म से हैं। बच्चियां सातवीं-आठवीं कक्षा की थीं। मैंने जब उनसे अलग बात की तो यह पता चला कि वे तीनों मुसलमान हैं। उनका कहना था कि वे आगे पढ़ना चाहती हैं मगर उनके माता-पिता इसके खिलाफ हैं। उनकी इस बात ने मेरे दिल को छुआ कि मेरे राज्य में तीन लड़कियां ऐसी हैं जो आगे कि शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुख्यमंत्री से मदद मांगने से हिचक नहीं रही हैं। मैंने इनके मां-बाप को कहलवाया कि वे लड़कियों की बात मानें। यह दो साल पहले की बात है। दोनों लड़कियां पढ़ रही हैं।
सिद्दीकी: आप ठीक कहते हैं कि पिछड़ों में मुसलमानों को हिस्सा तो दिया गया मगर मंडल के आने के बाद से पिछले 20 वर्षों में यह बात सामने आई हैं कि मुसलमानों को उनका हक नहीं मिलता। मशिाल के तौर पर दस नौकरियां हैं और अप्लाई करनेवाले पांच सौ हैं। इनमें 50 प्रतशित मुसलमानों ने भी अप्लाई किया है। मगर सभी नौकरियां हिंदू पिछड़ों को दी जाती हैं। मुसलमानों को कुछ नहीं मिलता। इसलिए सच्चर कमेटी ने इस बात पर जोर दिया कि पिछड़ों को आरक्षण में से मुसलमानों का अलग हिस्सा होना चाहिए।
मोदी: भारत के संविधान निर्माताओं ने इस बात पर बहुत गहराई से विचार किया था और यह फैसला किया था कि धर्म के आधार पर कोई आरक्षण नहीं दिया जाएगा। यह खतरनाक होगा। उस वक्त तो कोई आरएसएस वाले या बजरंग दल वाले नहीं थे।
सिद्दीकी: मुस्लिम लीडरों ने और यहां तक मौलाना आजाद तक ने धर्म के आधार पर आरक्षण का विरोध किया था। पिछले 64 वर्षों के अनुभव से हमें भी तो सिखना चाहिए। संविधान में हमने बहुत से संशोधन किए हैं। इसलिए अब 64 वर्ष बाद यदि हम मुसलमानों को उनका पिछड़ापन दूर करने के लिए आरक्षण देते हैं तो उसमें आपको क्या परेशानी है।
मोदी: नहीं, नहीं, वह यह बदलाव नहीं है। यह एक बुनियादी बात है। संविधान के बुनियादी ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। मगर मैं दूसरी बात कहता हूं कि जिन राज्यों को आप प्रगतशिील और सेकुलर 4 कहते हैं वहां मुसलमान नौकरियों में दो प्रतशित हैं, चार प्रतशित हैं। गुजरात में मुसलमानों का आबादी में
अनुपात 9 प्रतशित है। मगर नौकरियों में 12 से तेरह प्रतशित हैं। बंगाल में 25 प्रतशित मुसलमान हैं। मगर नौकरियों में 2 प्रतशित हैं। यह मैं नहीं कह रहा। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट कह रही है।
सिद्दीकी: गुजरात में तो मुसलमान पहले से ही आगे था। आपने कोई ऐसा कारनामा नहीं दिखाया है। मुसलमान बिजनेस में भी आगे था और तालीम में भी आगे था।
मोदी: चलिए आपकी बात मान लें। पिछले 20 सालों से गुजरात में बीजेपी की हुकूमत है। अगर हम उन्हें बर्बाद कर रहे होते तो क्या आज भी इतने ही आगे होते। अगर हमारा रूख मुस्लिम विरोधी था तो वे क्या 20 सालों में पिछड़ न जाते? सच्चर कमेटी का सर्वे उस वक्त हुआ जब मेरी सरकार थी। गुजरात में 85 से 95 तक सरकारी नौकरियों में भर्ती बंद थी। भर्ती तो मेरे जमाने में हुई। कुल छह लाख सरकारी नौकरियों में से तीन लाख मेरे समय में भर्ती किए गए।
सिद्दीकी: आपके समय में जो भर्ती हुई उसमें 10 से 12 प्रतशित मुसलमान थे।
मोदी: नहीं मैंने हिसाब नहीं लगाया है। यह मेरी फिलाँसफी नहीं है। न हीं मैं हिंदू मुसलमान के बुनियाद पर हिसाब लगाऊँगा। मेरा काम है कि मेरिट के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सबको मौका दिया जाए। अगर वे मुस्लिम हैं तो भी मिले। अगर वे हिंदू और पारसी हैं तो भी उन्हें मिलेगा। आप सच्चर कमेटी की हर बात पर वि’वास करते हैं। फिर सच्चर कमेटी ने मेरे वक्त की जो रिपोर्ट दी है। उसपर भरोसा क्यों नहीं करते?
दंगों में क्या हुआ?
सिद्दीकी: अब हम गुजरात दंगों की तरफ आएं। इस दौरान क्या हुआ। गोधरा में जो लोग जले उनकी लाशों को अहमदाबाद क्यों लाया गया। क्या आपको अंदाजा नहीं था कि इसके नतीजे क्या होंगे?
मोदी: इस सवाल का जवाब विस्तृत रूप से मैंने एसआईटी को भी दिया है और सुर्पीम कोर्ट को भी कोई भी लाश होगी तो उसे वापस तो करना ही होगा। जहां सबसे ज्यादा तनाव है वहां कोई लाश ले जा सकता है? तनाव गोधरा में था। इसलिए वहां से जली हुई लाशों को हटाना जरूरी था। ये पैसेंजर कहां जा रहे थे? यह टेªन अहमदबादा जा रही थी। इन लाशों को लेने वाले सब अहमदाबाद में ही थे। आपके पास लाशों को वापस करने का क्या तरीका है?
सिद्दीकी: आप किसी अस्पताल में लाकर खामोशी से उन्हें रि’तेदारों के हवाले कर देते। उन्हें घुमाया क्यों गया?
मोदी: आप सच्चाई सुन लीजिए। इतनी लाशों को रखने के लिए गोधरा में जगह नहीं थी। लाशों को वहां से हटाना था। प्रशासन ने सोचा की रात के अंधेरे में लाशें हटाई जाएं। इसीलिए उन्हें उसी रात वहां से हटाया गया। अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में ला सकते थे। मगर वह भीड़भाड़ वाला इलाका था। तनाव पैदा होता। यह प्रशासन की समझदारी थी कि सभी लाशों को शोला के अस्पताल में लाया गया। शोला बिल्कुल उस वक्त अहमदाबाद से बाहर था, जंगल था। शोला से कोई जुलूस नहीं निकला। लाशें खामोशी से रि’तेदारों के हवाले कर दी गईं। 13 या 14 ऐसी लाशें थीं जिनकी पहचान नहीं हो सकीं। उनका अंतिम संस्कार भी अस्पताल के पीछे ही कर दिया गया। 5
दंगे क्यों नहीं रूके
सिद्दीकी: इसके बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे। लोग मारे जा रहे थे। घर जलाए जा रहे थे। आप गुजरात के मुख्यमंत्री थे। आपको तो खबर थी कि क्या हो रहा है। अहमदाबाद में क्या हो रहा है। आपने इस खून-खराबे को रोकने के लिए क्या कदम उठाए?
मोदी: इसके लिए सबसे पहले काम हमलोगों ने यह किया कि शांति और अमन बनाए रखने की अपील की। यह मैने गोधरा से ही किया। इसके बाद अहमदाबाद आकर शाम को रेडियो टीवी से अपील की। मैंने प्रशासन से कहा कि जितनी पुलिस है सबको लगा दो। हालांकि यह बहुत बड़ा वाकया था। पहले ऐसा नहीं हुआ। एक वह वक्त था जब पहले कोई वाकया होता था तो दूसरे दिन अखबार में खबर आती थी। फोटो आने में भी दो दिन लग जाते थे। इतने में आव’यक कदम उठाने का मौका मिल जाता था। फोर्स भेजने का भी मौका मिल जाता था। आज टीवी पर घटना के चंद मिनटो बाद खबर आ जाती हैं। तस्वीरें दिखानी शुरू हो जाती हैं। प्रशासन को आज टीवी की स्पीड से मुकाबला करना पड़ता है। अहमदाबाद से बड़ौदा तो फोन चंद मिनटों में हो जाता है। मगर पुलिस फोर्स भेजनी हो तो कम से कम दो घंटे लगेंगे।
पुलिस फोर्स टीवी न्यूज की स्पीड की मुकाबला नहीं कर सकती। दूसरा मैं देश के अन्य भागों में हुए दंगों से तुलना करूं। मैं इस बात में वि’वास नहीं करता कि 1984 में दिल्ली में क्या हुआ? इसके लिए हमारे यहां हुआ तो क्या बात है? दंगा दंगा है। 1984 के दंगे में एक भी जगह गोली नहीं चली और न लाठी चार्ज हुआ। अगर लाठी चार्ज हुआ तो सिर्फ एक जगह हुआ। जहां इंदिरा गांधी की डेड बाँडी रखी हुई थी। वहां इतनी भीड़ जमा हो गई थी कि उसको कंट्रोल करने के लिए लाठी चार्ज हुआ। लेकिन दंगा रोकने के लिए पुलिस का इस्तेमाल नहीं हुआ। गुजरात में 27 फरवरी को गुजरात में कितनी जगह गोली चली, लाठी चार्ज हुआ, कफ्र्यू लगाया गया। कार्रवाई हुई।
हिंदुओं को खुली छूट
सिद्दीकी: लेकिन आपकी पार्टी के लोग आपकी प्रशासन के अफ्सर यह कहते हैं कि आपने कहा कि हिंदुओं को 48 घंटे गुस्सा निकालने दो। हरेन पांड्या और संजीव भट्ट ने यह आरोप लगाया। आप इसके बारे में क्या कहते हैं?
मोदी: आपको किसी पर तो भरोसा करना होगा। मुझ पर नहीं तो सुर्पीम कोर्ट पर करें। सुर्पीम कोर्ट ने जांच करवाई। इसकी रिपोर्ट में क्या कहा गया। मैंने क्या कार्रवाई की। इसके बारे में मैं आपको पूरे तथ्य पेश कर रहा हूं। कहां-कहां गोली चली? कितने लोग मारे गए। आज तो मीडिया जागा हुआ है। कोई बात छुपती नहीं है। कोई झूठ चलता नहीं है। मैं एक बहुत महत्वपूर्ण बात बताता हूं। मगर छापना मत (इसके बाद मोदी ने फौज के बुलाने के बारे में कुछ बातें कहीं मगर उन्हें प्रकाशित करने से मना कर दिया) एक और झूठ है। 27 फरवरी को गोधरा का वाकया हुआ। 28 को दंगे भड़के। 1 मार्च को फौज बुलाई गई। मीडिया के कुछ लोग कहते हैं कि तीन दिन तक फौज नहीं बुलाई। वे यह भूल जाते हैं कि फरवरी में 28 दिन ही होते हैं। यानी हमने अगले ही दिन अहमदाबाद को फौज के हवाले कर दिया था। गाली देने से पहले तो सोच लीजिए।
दंगों की योजना पहले से ही थी
सिद्दीकी: मगर दंगे तो ऐसे हुए जैसे उनकी पहले से तैयारी थी। मुसलमानों के घर और दूकानों को चुन-चुनकर जलाया गया। जैसे पहले से ही नशिान लगाए गए थे। पहले से ही प्लान तैयार था। मुसलमानों की सूचियां बनी हुई थीं।
मोदी: यह सब झूठ है। प्राँपोगंडा है। उस वक्त की खबरें देखिए कि कितने मुसलमानों को बचाया गया है। अगर हम बचाने की कोशिश न करते तो कौन बचता? क्या-क्या कार्रवाई हुई इसका विवरण एसआईटी के पास है।
सिद्दीकी: हिंदुस्तान के मुसलमानों के दिल में शक है, जख्म है। इसलिए लोग सच्चाई जानना चाहते हैं कि आपके मिनिस्टर पुलिस कंट्रोल रूम में मौजूद थे।
मोदी: झूठ, सरासर झूठ। तमाम सच्चाईयां एसआईटी के पास हैं। सुर्पीम कोर्ट ने जांच की है। उन्होंने क्या पाया इसका इंतजार करिए। मेरे कहने न कहने से फर्क नहीं पड़ता।
सिद्दीकी: अहमदाबाद में जो दंगे हो रहे थे इसकी आपको पहले से ही खबर थी। क्या आपने शहर का राउंड लिया? रिफ्यूजी कैंपों में गए?
मोदी: मैं सब जगह गया। सबकी फिक्र की। यह प्राँपोगंडा फैलाया जाता है कि रिफ्यूजी कैंप सरकार ने नहीं चलाए। हमारे यहां गुजरात में सामाजिक ढांचा बहुत मजबूत है। जब भूचाल आया था तो भी हमने कैंप नहीं लगाए थे। हमने सारा इंतजाम अनाज, राशन आदि सामाजिक संगठनों के हवाले कर दिया था। इन शिविरों को चलाने वाले मुसलमान हो सकते हैं। मगर उनकी सारी जरूरतें सरकार पूरी कर रही थी। इसका पूरा रिकाँर्ड है। कहां क्या दिया गया। कितना अनाज और दूसरी चीजें दी गईं? इतना ही नहीं दसवीं के इम्तेहान थे। इसका पूरा इंतजाम हमने किए। मुसलमान बच्चों ने इम्तेहान दिए और पास हुए। इसपर भी लोग अदालत गए मगर गलत साबित हुए। मगर कुछ लोगों ने और मीडिया ने मेरे खिलाफ झूठ फैलाने का ठेका ले रखा है।
वाजपेयी ने क्या कहा?
सिद्दीकी: उस वक्त अटल बिहारी बाजपेयी ने आपसे क्या कहा? उन्होंने आपसे कहा कि आपने राजधर्म नहीं निभाया।
मोदी: यह झूठ चलाया जाता है। अटल जी ने जिस भाषण में कहा कि राजधर्म निभाना चाहिए। उसी में उन्होंने आगे कहा था कि मुझे मालूम है कि गुजरात में राजधर्म निभाया जाता है। इसी का अगला जुमला है। मगर मीडिया उसे गायब कर देता है। हालांकि उसका वीडिया रिकाँर्ड मौजूद है।
सिद्दीकी: आज दस वर्ष दंगे को हो गए हैं। आपसे अटल जी ने क्या कहा? दंगा रोकने के लिए क्या कदम उठाए? आपसे प्रधानमंत्री की क्या बात हुई? कुछ तो बताइए।
मोदी: उन्होंने कहा कि हम मिलजुलकर बेहतर करने की कोशिश करें और हालात पर काबू पाएं।
फांसी पर लटका दो
सिद्दीकी: 1984 की दंगों की राजीव गांधी ने माफी मांगी, एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के खिलाफ कार्रवाई हुई। उनका राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने भी माफी मांगी। फिर आखिर आपने 2002 के गुजरात दंगों पर माफी क्यों नहीं मांगी? अफसोस का इजहार क्यों नहीं किया? जबकि यह आपकी जिम्मेवारी थी।
मोदी: पहली बात उस वक्त मैंने क्या बयान दिए थे। उन्हें देख लीजिए। उस गर्मा-गर्मी के माहौल में मोदी ने क्या कहा? 2004 में मैंने एक इंटरव्यू में कहा था मुझे क्यों माफ करना चाहिए? अगर मेरी सरकार ने यह दंगे करवाए। तो उसे बीच चौराहे पर फांसी लगनी चाहिए। और ऐसी फांसी होनी चाहिए कि अगले सौ साल तक किसी शासक को ऐसा पाप करने की हिम्मत न हो। जो लोग माफ करने की बात कर रहे हैं वे पाप को बढ़ावा दे रहे हैं। अगर मोदी ने गुनाह किया है तो उसे फांसी पर लटका दो। मगर अगर राजनीतिक कारणों से मोदी को गाली देनी है तो इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है।
सिद्दीकी: जो हुआ उसके लिए आपके दिल में कोई दुख है। हजारों लोग मरे इसके लिए आपको कोई अफसोस है? मैं एक अखबार का एडिटर हूं। अगर उसमें कोई गलत बात छपती है तो मैं माफी मांगता हूं।
मोदी: आज माफी मांगने का क्या मतलब है। मैंने तो उसी वक्त जिम्मेवारी ली। अफसोस किया माफी मांगी। देखिए 2002 में दंगे के बाद क्या कहा? इसकी एक काँपी मुझे उन्होंने दी। आप यह तो लीखिए कि हम दस सालों से मोदी के साथ अन्याय कर रहे हैं। हमें माफी तो मोदी से मांगनी चाहिए।
इंसाफ क्यों नहीं मिला?
सिद्दीकी: चलिए दंगे हो गए। मगर इसके बाद क्या हुआ? मुसलमानों को आजतक इंसाफ नहीं मिला। आपके प्रशासन ने तो तभी सभी कातिलों को बरी कर दिया। जब तक सुर्पीम कोर्ट ने एसआईटी बनाकर आप पर सजा देने के लिए मजबूर नहीं किया। आपने कोई कदम नहीं उठाया।
मोदी: आप झूठे प्रचार का शिकार हो गए हैं।
सिद्दीकी: हम भी झूठ के शिकार हैं। पूरी दुनिया शिकार है।
मोदी: एक स्वार्थी ग्रुप है वह शिकार है। जिस एसआईटी की आप बात कर रहे हैं उसने तो छह-सात मुकदमों की जांच की है। आपकी जानकारी के लिए गुजरात में तो हजारों एफआईआर दर्ज हुए। हजारों गिरफ्तार हुए। आज तक देश में जितने दंगे हुए। 1984 के दंगों में एक भी आदमी को सजा नहीं हुई। जबकि हमारे यहां 50 केसों में सजाएं हो चुकी हैं। आप जिन दो केसों की बात करते हैं वह गुजरात से बाहर ले गए। इनकी जांच किसने की? गुजरात पुलिस ने, गोवा कौन लाया? गुजरात पुलिस। चार्जशीट किसने बनाई? गुजरात पुलिस ने। हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। इस मामले को गुजरात से बाहर ले गए। वही कागज, वही गवाह, वही गुजरात पुलिस की जांच। महाराष्ट्र की अदालत ने सजा दी। कोई नई जांच तो नहीं की। आपने न्यायालय पर अवि’वास किया है। गुजरात पुलिस पर नहीं। बल्किस बानो केस की जांच गुजरात पुलिस ने की और बाद में उसे सीबीआई के हवाले कर दिया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि गुजरात पुलिस ने इस मामले में जिन्हें गिरफ्तार किया था। उन्हें सजा हुई। सीबीआई ने जिन्हें 8 गिरफ्तार किया था वे निर्दोष सिद्ध होकर बरी हुए। एक पुलिस वाले ने सीबीआई को कागज देने में देर की तो उसे सजा हुई।
सिद्दीकी: पिछले दस सालों में गुजरात में मुसलमानों के फर्जी एनकाउंटर हुए। इनके केस चल रहे हैं। आपके पुलिस अधिकारी जेल में है। आपका प्रशासन....
मोदी ने बात काटते हुए कहा सुन लीजिए..सुन लीजिए..मायावती जी ने चुनाव से पहले अपने विज्ञापन में लिखा है कि हमने 393 एनकाउंटर करके शांति स्थापित की है। मेरे यहां तो सिर्फ 12 एनकाउंटर ही हुए। इनके मुकदमें चल रहे हैं। अभी किसी को सजा नहीं हुई है। ह्यूमन राइट्स कमीशन ने कहा है कि देश में जो एनकाउंटर हुए उनमें 400 फर्जी थे। सुर्पीम कोर्ट में अर्जी लगी है कि इन सबकी जांच होनी चाहिए। ऐसा क्यों नहीं हो रहा है। सिर्फ गुजरात के एनकाउंटरों की जांच हो रही है। देश के बाकी हिस्सों में होनेवाले एनकाउंटरों की जांच क्यों नहीं?
सिद्दीकी: ऐसा क्यों हो रहा है?
मोदी: क्योंकि गुजरात को नशिाना बनाया गया है। मुंबई में एनकाउंटर हो रहे हैं। मगर उनकी जांच नहीं हो रही। हर पार्टी गुजरात को बदनाम करने लगी है। वह ऐसा कर रही है।
सिद्दीकी: क्या कांग्रेस ऐसा कर रही है?
मोदी: जो भी पार्टी गुजरात को बदनाम करने में लगी है वह ऐसा कर रही है। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता।
मोदी तानाशाह है
सिद्दीकी: मगर आपकी अपनी पार्टी के लोग वि’व हिंदू परिषद, बजरंग दल, आरएसएस के लोग यह इल्जाम लगाते हैं कि आप एक डिक्टेटर हैं। लोगों की जुबान बंद कर देते हैं। वे तो आपके विरोधी नहीं। आपके अपनी पार्टी के हैं।
मोदी: मेरे पास कोई ऐसी जानकारी नहीं मगर फिर भी कोई ऐसा कहता है तो यह लोकतंत्र है।
मोदी प्रधानमंत्री
सिद्दीकी: कहा जाता है कि आप देश का प्रधानमंत्री बनने की तैयारी कर रहे हैं। आप गुजरात से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की जिम्मेवारी संभालना चाहते हैं। अगर आप देश के प्रधानमंत्री बनें तो आपके क्या पांच महत्वपूर्ण काम होंगे।
मोदी: देखिए। मैं बुनियादी तौर पर संगठन का व्यक्ति हूं। कुछ खास परिस्थितियों में मैं मुख्यमंत्री बन गया। जिंदगी में मैं किसी स्कूल के माँनिटर का भी चुनाव नहीं लड़ा था। मैं कभी किसी का एलेक्शन एजेंट भी नहीं बना। मैं तो इस दुनिया का इंसान ही नहीं हूं। ना ही इस दुनिया से मेरा कुछ लेना देना रहा। आज मेरी मंजिल है छह करोड़ गुजराती। उनकी भलाई, उनका सुख। मैं अगर गुजरात में अच्छा काम करता हूं तो यूपी और बिहार के दस लोगों की नौकरी लगती है। मैं हिंदुस्तान की सेवा गुजरात के विकास द्वारा करूंगा। गुजरात में अगर नमक अच्छा पैदा होगा तो सारा देश गुजरात का नमक खाएगा। मैंने गुजरात का नमक खाया है और सारे देश को गुजरात का नमक खिलाता हूं। 9
मुसलमानों के लिए क्या किया?
सिद्दीकी: आखिर आपने गुजरात के मुसलमानों की भलाई के लिए कोई काम किया?
मोदी: मैं हिंदू मुसलमान की सोच नहीं रखता। मैंने तो यह देखा है कि जो पिछड़ा हुआ है उसे आगे बढ़ाया जाए। समुंदर के तटीय क्षेत्र में मुसलमान ज्यादा हैं। हमने 1500 करोड़ का पैकेज दिया है। वहां हमने आईआईटी खोले हैं। स्कूल खोले हैं। मछुआरों के बच्चों को विमान चालन के बारे में बताया है। मछुआरों को छह महीने रोटी मिलती है। मैंने वहां पर सीवीड उगाने का काम किया है। ताकि मछुआरों को रोजी मिल सके।
मोदी की पतंग
सिद्दीकी: अहमदाबाद में बहुत से इलाके दलितों और मुसलमानों के ऐसे हैं जो पिछड़े हैं। वहां बैंक नहीं हैं। अस्पताल नहीं हैं।
मोदी: यहां शहरी समृद्धि योजना है। इसके तहत काम हो रहा है। कंप्यूटर की शिक्षा दी जा रही है। बैंक नहीं हैं। यह काम केंद्र का है। आपकी प्रिय कांग्रेस सरकार का काम है। गुजरात में पतंगबाजी बहुत बड़ा उद्योग है। इसे 99 प्रतशित मुसलमान चलाते हैं। मैंने इसका गहराई से अध्ययन किया है। मैं बोलना शुरू करूं तो आप भी पतंगबाजी पर मुझे पीएचडी की डिग्री दे देंगे। अहमदाबाद में जो पतंग बनती थी। वह 34 जगह जाती थीं। कही बांस बनता था तो कहीं गुंद, कही कागज। इससे काफी महंगा पड़ता था। मैंने रिसर्च करवाई। पहले यह पतंग उद्योग 8-9 करोड़ का था आज 50 करोड़ का है। पहले पतंग का कागज तीन रंगों का अलग-अलग लगता है। मैंने कागज वालों से कहा कि वो एक ही कागज का तीन रंग का छाप दें। पतंग का बांस असम से आता है। मैंने रिसर्च करवाया अब गुजरात में ही बांस पैदा हो रहे हैं। आज हम सबसे ज्यादा चीनी वाला गणना पैदा कर रहे हैं। यह फायदा किसे मिला? आप कहेंगे मुसलमान को मिला। मैं कहुंगा मेरे गुजरातियों को मिला।
मोदी का सेकुलरिज्म
सिद्दीकी: मोदी जी, क्या आप हिंदुस्तान को सेकुलर मुल्क बनाए रखना चाहेंगे। क्या आपका सेकुलरवाद में विश्वास है?
मोदी: जो लोग हिंदुस्तान को सेकुलरिज्म सिखा रहे हैं। वे अब देश की तौहीन कर रहे हैं। यह देश शुरू से ही सेकुलर है। भारत अफगानिस्तान का हिस्सा था तब भी वह सेकुलर था। पाकिस्तान में भी जब तक हिंदू थे। वह सेकुलर था। बांग्लादेश सेकुलर था। आप यह देखिए कि कौन सी पार्टी है जिसने देश से सेकुलरिज्म को खत्म किया?
सिद्दीकी: आप एक शब्द इस्तेमाल करते हैं सोडो सेकुलरिज्म। इसका क्या मतलब है?
मोदी: सोडो सेकुलर वे होते हैं जो नाम के सेकुलर होते हैं काम के नहीं। जो उपदेश बड़े-बड़े देते हैं काम फिरकापरस्ती के करते हैं। अब हमारे यहां भाजपा के एक लीडर थे। शंकर सिंह वाघेला। आज वे कांग्रेस के बहुत बड़े सेकुलर लीडर बन गए हैं। आप में से कोई उनसे यह पूछे कि जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया तो उस वक्त वे कहां थे? वे किस स्टेज पर खड़े हुए थे? अब वे कांग्रेस में शामिल हो गए तो सेकुलर हो गए। उनके सब पाप धूल गए। वे मुसलमानों से कहते हैं कि मुझे वोट दो। क्योंकि मैं मोदी से लड़ रहा हूं। हम इसको सेकुलरिज्म कहते हैं।
अखंड भारत
सिद्दीकी: क्या आप फिर भारत को अखंड भारत बनाना चाहते हैं? क्या आपका यह स्वप्न है?
मोदी: मेरा स्वप्न है कि क’मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक रहे, नेक रहें। सब सुखी रहें। सबका कल्याण हो। जो साम्राज्यवादी मनोवृत्ति के लोग हैं वे पाकिस्तान में अखंड भारत का आंदोलन चला रहे हैं। पाकिस्तान में आदोलन चल रहा है कि पाकिस्तान, हिंदुस्तान और बांग्लादेश एक हो जाएं ताकि यहां पर मुसलमान बहुसंख्यक हो जाएं। आजकल आपलोगों के भी मुंह में पानी आ रहा है। इसलिए कि आप अखंड भारत के नाम पर मुस्लिम बहुल देश बनाना चाहते हैं। सब मुसलमानों को इकट्ठा करके हिंदुस्तानी मुसलमानों को आगे लाकर तनाव पैदा किया जाए। आपका भी यह सपना होगा।
सिद्दीकी: मेरा सपना तो संयुक्त हिंदुस्तान का था। मेरे पिता ने देश के विभाजन का विरोध किया था। पाकिस्तान बनने का विरोध किया था। हमारा स्वप्न तो पूरे उपमहाद्वीप में शांति स्थापित करने का है।
हिंदू आतंकवाद
सिद्दीकी: गत दिनों आतंकवाद बढ़ा है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता मगर आज कुछ हिंदू भी आतंकवादी बने हैं तो इसका मुकाबला करने के लिए क्या कदम उठाएं।
मोदी: सख्त कानून बनाया जाए।
सिद्दीकी: आपने तो सख्त कानून पोटा के तहत सिर्फ मुसलमानों को पकड़ा है।
मोदी: हमने जिन्हें गिरफ्तार किया। इनके मामले सुर्पीम कोर्ट तक गए। मगर अदालत में एक भी केस गलत नहीं पाया। देश के दूसरे हिस्से में पोटा का गलत इस्तेमाल हुआ हो। मगर गुजरात में नहीं हुआ। हमारा पोटा लगाया हुआ एक भी केस झूठा नहीं निकला। जब यहां कांग्रेस की सरकार थी। इसमें हजारों लोग टाडा में गिरफ्तार हुए। उस वक्त भाजपा के अध्यक्ष मक्रांत देसाई थे। उन्होंने टाडा के खिलाफ कांफ्रेंस की। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि जिनलोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें 80 प्रतशित मुसलमान थे।
सिद्दीकी: सिम्मी पर तो पाबंदी तो लगा दी गई। मगर आपलोग अभिनव भारत पर पाबंदी लगाने की मांग क्यों नहीं करते?
मोदी: अभी तक अभिनव भारत की संगठन की कोई तस्वीर सामने नहीं आई। इंडियन मुजाहिदीन की तस्वीर भी सामने नहीं आई। ये हैं क्या? उन्हे कौन चला रहा है? सरकार बताए। पहले पता लगे। तभी तो आप संगठन पर पाबंदी लगाएंगे। सिर्फ गुब्बारे छोड़ने से क्या फायदा। कांग्रेस कभी अभिनव भारत का गुब्बारा छोड़ती है और कभी इंडियन मुजाहिद्दीन का मगर सरकार के सामने न पूरी सच्चाई रखती है ना पूरी तस्वीर
सिद्दीकी: गुजरात के चुनाव नजदीक हैं। आप क्या समझते हैं आपके लिए सबसे बड़ा चैलेंज क्या है?
मोदी: हम खुद ही अपने लिए सबसे बड़ा चैलेंज हैं। क्योंकि हमने स्तर इतना बुलंद कर लिया है कि लोग हमारे स्तर पर हमें नापते हैं। मोदी 16 घंटे काम करता है तो लोग कहते हैं कि अठारह घंटे क्यों नहीं? लोगों की आकांक्षाएं मोदी से बहुत ज्यादा है। इसलिए हमें अपने रिकाँर्ड खुद ही तोड़ने पड़ते हैं।
मोदी के खिलाफ बगावत
सिद्दीकी: आज आपकी पार्टी के अंदर बगावत है। आपके खिलाफ चैलेंज है।
मोदी: यह मैंने जनता पर छोड़ दिया है। वह फैसला करे। मैंने पिछले दस वर्षों में हर चुनाव जीता है। मुझे उम्मीद है कि हम यह भी जीतेंगे।
सिद्दीकी: आप मुसलमानों को कोई संदेश देना चाहेंगे।
मोदी: भाई मैं बहुत छोटा इंसान हूं। मुझे किसी को संदेश देने का हक नहीं है। खादिम हूं। खिदमत करता रहूंगा। मैं अपने मुसलमान भाईयों से कहना चाहूंगा कि वे किसी के लिए सिर्फ एक वोट बनकर न रहें। आज हिंदुस्तान की राजनीति में मुसलमान को सिर्फ वोट बना दिया गया है। मुसलमान स्वप्न देखें। उनके स्वप्न उनके बच्चों के स्वप्न पूरे हों। वे वोटर रहें और अपने वोट का खुलकर इस्तेमाल करें। मगर उन्हें इसके आगे एक इंसान एक भारतीय के रूप में देखा जाए। उनकी तकलीफों को समझा जाए। मैं अगर उनके किसी काम आ सकता हूं तो आउंगा। मगर उन्हें भी खुले दिमाग से देखना होगा। सोचना होगा।
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Thursday, September 2, 2010
क्या चोरी चकारी करना हमारे विधायकों का जन्म सिद्व अधिकार है?
अगर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने न्याय किया और मध्य प्रदेश विधानसभा के अपने रिकॉर्ड पर कार्रवाई की तो प्रदेश के बहुत सारे विधायक जालसाजी के आरोप में जेल में नजर आएंगे। उन सबने फर्जी यात्रा बिल दे कर बहुत बेशर्मी से कुल मिला कर करोड़ों रुपए के यात्रा भत्ते की चोरी की है। यह खुलासा जिस अखबार ने किया है उसे विधायकों के कोप से बचने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी है।
देश में पहली बार किसी अखबार ने इतनी हिम्मत की है। हालांकि ऐसा नहीं कि लोकसभा और दूसरे राज्यों की विधानसभाओं में ऐसा होने के संकेत नहीं मिले हो लेकिन मध्य प्रदेश विधानसभा में एक अखबार ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए फर्जी यात्रा बिलों और दूसरे तरीकों से विधायकों की लाखों रुपए की चोरी पकड़ी और जवाब मांगा। निर्वाचित जनप्रतिनिधि जैसे हमेशा देश और उसके पैसे को बाप का माल समझते है वैसे ही यहां भी किया गया।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से प्रकाशित राज एक्सप्रेस के संपादक पर विधानसभा का विशेषाधिकार हनन करने का नोटिस थमा दिया गया। चोरी चकारी करना हमारे विधायकों का शायद जन्म सिद्व अधिकार हो और वही उनका विशेषाधिकार हो। मगर तथ्य सामने थे। एक ही विधायक एक समय में विधानसभा में भी था, अपने चुनाव क्षेत्र में भी था, दिल्ली या मुंबई में भी था और रेल, जहाज और टेक्सी से एक साथ चल रहा था। ऐसे अवतारी नेताओं के पास जवाब था नहीं और आम तौर पर क्षेत्रीय अखबार डर जाते हैं, विधायकों के दुर्भाग्य से राज एक्सप्रेस के मालिक अरुण सेहलोत और संपादक रवींद्र जैन ने बेईमानों से पंजा लड़ाने की ठान ली।
ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई अखबार पूरी विधानसभा के खिलाफ उसकी चोरियां पकड़वाने के लिए उच्च न्यायालय में गया है। अभी वह नाटक नौटंकी होनी बाकी है जिसमें यह तय किया जाएगा कि जनता के प्रतिनिधि बड़े है या अदालत का जज। न्याय प्रक्रिया और विधायिका के बीच एक नैतिक सवाल पर लड़ाई हो सकती है मगर यहां तो विधायक की हैसियत से नहीं बल्कि सरकारी पैसे के चोरों की हैसियत से इन लोगों से सवाल किया गया है और चोरों के पास जवाब कभी नहीं होता।
अरुण सेहलोत और रवींद्र जैन ने मई और जून के महीने में मध्य प्रदेश विधानसभा के कुछ विधायकों द्वारा मिले विशेषाधिकार हनन के नोटिस और इसके बाद इन नोटिसों को विशेषाधिकार समिति को भेजे जाने की सूचना जुलाई में आई। राज एक्सप्रेस ने सवाल किया है कि क्या संविधान की धारा 194 के तहत नेक इरादे से और जनहित में विधायकों द्वारा सरकारी पैसा हजम करने की खबर जनता को देना गलत है? क्या इस सूचना का विधानसभा की कार्रवाई से कोई रिश्ता है? उच्च न्यायालय में दी गई याचिका में सवाल यह भी किया गया है कि क्या विधानसभा के विशेषाधिकार नोटिस की, विधायकों की बेईमानी के साफ सरकारी प्रमाणों के बावजूद संविधान की धारा 226 के तहत समीक्षा की जा सकती है?
सवाल तो यह भी है क्या विधानसभा अपने ही रिकॉर्ड से इनकार कर सकती है और अपनी ही द्वारा दी गई सूचनाआें को गलत साबित कर सकती है? कुल मिला कर सवाल यह है कि जिन्हें हम वोट देते हैं क्या उनके कुकर्मों पर सवाल भी नहीं उठा सकते? राज एक्सप्रेस ने सीधे सवाल किया है कि आखिर विधायकों के वेतन भत्ता नियमों को किस हद तक तोड़ा गया है और यह अपराध है या नहीं? अगर यह अपराध है तो अपराधी सफाई देने की बजाय आरोप लगाने पर कैसे तुल गए? विधानसभा के अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी को भी सवाल उठता ही है और अदालत में उन्हें भी पार्टी बनाया गया है और पूछा गया है कि बजाय विधायकों के खिलाफ दिए गए सबूतों की जांच करने के उन्होंने अखबार को कैसे जारी होने दिया?
इसके अलावा नोटिस का जवाब देने के लिए जिस और रिकॉर्ड की जरूरत थी, वह देने से इनकार कर दिया गया और सीधे मामला विधायकों ने अपनी ही एक अदालत में पहुंचा दिया। विशेषाधिकार समिति के अध्यक्ष और विधायक गिरीश गौतम न्यायमूर्ति की हैसियत में जरूर है मगर अखबार में तो चोरों की सूची में उनका भी नाम लिखा है। उन्होंने भी विधानसभा से गलत और फर्जी तरीकों से भत्ते लिए हैं। अखबार ने संविधान की ही धारा 19/1 और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए जनहित में अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल उठाया है और पूछा है कि हमारे जनप्रतिनिधि किसके प्रति जवाबदेह है?
विधानसभा के अपने नियमों पर भी अगर कोई विधायक विधानसभा के आठ किलोमीटर के दायरे में रहता है तो उसे कोई यात्रा भत्ता नहीं मिलता। आखिर विधायकों को भी छह रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से मिलता हैं। यहां तो कमाल यह हुआ कि एक ही विधायक एक ही जगह से एक ही जगह की यात्रा करता है और उसके बिल में हजारों रुपए का फर्क होता है। इसे कहते है चोरी और सीनाजोरी।
अखबार को सूचना के अधिकार के तहत बताया गया कि भोपाल के लोकल विधायकों ने भी दबा कर यात्रा भत्ता वसूले है। वे एक साथ रेल, जहाज और बस से भी यात्रा करने की प्रतिभा रखते हैं तो मध्य प्रदेश इतना पिछड़ा हुआ क्यों हैं? इस प्रतिभा का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा? होना तो ये चाहिए कि जिस तरह की जानकारी मध्य प्रदेश विधानसभा के माननीय विधायकों के बारे में सार्वजनिक हुई हैं उसके बारे में संसद और देश की सभी विधानसभाओं में जांच होनी चाहिए तो यह खेल अरबों रुपए के घोटाले का हो जाएगा।
साभार : आलोक तोमर - डेटलाइन इंडिया
देश में पहली बार किसी अखबार ने इतनी हिम्मत की है। हालांकि ऐसा नहीं कि लोकसभा और दूसरे राज्यों की विधानसभाओं में ऐसा होने के संकेत नहीं मिले हो लेकिन मध्य प्रदेश विधानसभा में एक अखबार ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए फर्जी यात्रा बिलों और दूसरे तरीकों से विधायकों की लाखों रुपए की चोरी पकड़ी और जवाब मांगा। निर्वाचित जनप्रतिनिधि जैसे हमेशा देश और उसके पैसे को बाप का माल समझते है वैसे ही यहां भी किया गया।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से प्रकाशित राज एक्सप्रेस के संपादक पर विधानसभा का विशेषाधिकार हनन करने का नोटिस थमा दिया गया। चोरी चकारी करना हमारे विधायकों का शायद जन्म सिद्व अधिकार हो और वही उनका विशेषाधिकार हो। मगर तथ्य सामने थे। एक ही विधायक एक समय में विधानसभा में भी था, अपने चुनाव क्षेत्र में भी था, दिल्ली या मुंबई में भी था और रेल, जहाज और टेक्सी से एक साथ चल रहा था। ऐसे अवतारी नेताओं के पास जवाब था नहीं और आम तौर पर क्षेत्रीय अखबार डर जाते हैं, विधायकों के दुर्भाग्य से राज एक्सप्रेस के मालिक अरुण सेहलोत और संपादक रवींद्र जैन ने बेईमानों से पंजा लड़ाने की ठान ली।
ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई अखबार पूरी विधानसभा के खिलाफ उसकी चोरियां पकड़वाने के लिए उच्च न्यायालय में गया है। अभी वह नाटक नौटंकी होनी बाकी है जिसमें यह तय किया जाएगा कि जनता के प्रतिनिधि बड़े है या अदालत का जज। न्याय प्रक्रिया और विधायिका के बीच एक नैतिक सवाल पर लड़ाई हो सकती है मगर यहां तो विधायक की हैसियत से नहीं बल्कि सरकारी पैसे के चोरों की हैसियत से इन लोगों से सवाल किया गया है और चोरों के पास जवाब कभी नहीं होता।
अरुण सेहलोत और रवींद्र जैन ने मई और जून के महीने में मध्य प्रदेश विधानसभा के कुछ विधायकों द्वारा मिले विशेषाधिकार हनन के नोटिस और इसके बाद इन नोटिसों को विशेषाधिकार समिति को भेजे जाने की सूचना जुलाई में आई। राज एक्सप्रेस ने सवाल किया है कि क्या संविधान की धारा 194 के तहत नेक इरादे से और जनहित में विधायकों द्वारा सरकारी पैसा हजम करने की खबर जनता को देना गलत है? क्या इस सूचना का विधानसभा की कार्रवाई से कोई रिश्ता है? उच्च न्यायालय में दी गई याचिका में सवाल यह भी किया गया है कि क्या विधानसभा के विशेषाधिकार नोटिस की, विधायकों की बेईमानी के साफ सरकारी प्रमाणों के बावजूद संविधान की धारा 226 के तहत समीक्षा की जा सकती है?
सवाल तो यह भी है क्या विधानसभा अपने ही रिकॉर्ड से इनकार कर सकती है और अपनी ही द्वारा दी गई सूचनाआें को गलत साबित कर सकती है? कुल मिला कर सवाल यह है कि जिन्हें हम वोट देते हैं क्या उनके कुकर्मों पर सवाल भी नहीं उठा सकते? राज एक्सप्रेस ने सीधे सवाल किया है कि आखिर विधायकों के वेतन भत्ता नियमों को किस हद तक तोड़ा गया है और यह अपराध है या नहीं? अगर यह अपराध है तो अपराधी सफाई देने की बजाय आरोप लगाने पर कैसे तुल गए? विधानसभा के अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी को भी सवाल उठता ही है और अदालत में उन्हें भी पार्टी बनाया गया है और पूछा गया है कि बजाय विधायकों के खिलाफ दिए गए सबूतों की जांच करने के उन्होंने अखबार को कैसे जारी होने दिया?
इसके अलावा नोटिस का जवाब देने के लिए जिस और रिकॉर्ड की जरूरत थी, वह देने से इनकार कर दिया गया और सीधे मामला विधायकों ने अपनी ही एक अदालत में पहुंचा दिया। विशेषाधिकार समिति के अध्यक्ष और विधायक गिरीश गौतम न्यायमूर्ति की हैसियत में जरूर है मगर अखबार में तो चोरों की सूची में उनका भी नाम लिखा है। उन्होंने भी विधानसभा से गलत और फर्जी तरीकों से भत्ते लिए हैं। अखबार ने संविधान की ही धारा 19/1 और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए जनहित में अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल उठाया है और पूछा है कि हमारे जनप्रतिनिधि किसके प्रति जवाबदेह है?
विधानसभा के अपने नियमों पर भी अगर कोई विधायक विधानसभा के आठ किलोमीटर के दायरे में रहता है तो उसे कोई यात्रा भत्ता नहीं मिलता। आखिर विधायकों को भी छह रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से मिलता हैं। यहां तो कमाल यह हुआ कि एक ही विधायक एक ही जगह से एक ही जगह की यात्रा करता है और उसके बिल में हजारों रुपए का फर्क होता है। इसे कहते है चोरी और सीनाजोरी।
अखबार को सूचना के अधिकार के तहत बताया गया कि भोपाल के लोकल विधायकों ने भी दबा कर यात्रा भत्ता वसूले है। वे एक साथ रेल, जहाज और बस से भी यात्रा करने की प्रतिभा रखते हैं तो मध्य प्रदेश इतना पिछड़ा हुआ क्यों हैं? इस प्रतिभा का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा? होना तो ये चाहिए कि जिस तरह की जानकारी मध्य प्रदेश विधानसभा के माननीय विधायकों के बारे में सार्वजनिक हुई हैं उसके बारे में संसद और देश की सभी विधानसभाओं में जांच होनी चाहिए तो यह खेल अरबों रुपए के घोटाले का हो जाएगा।
साभार : आलोक तोमर - डेटलाइन इंडिया
Sunday, August 29, 2010
क्या आपने विनायक दामोदर सावरकर की "Indian War of Independence 1857" पढी है?

कुछ बेबकूफ कांग्रेसी और बुद्धिहीन कम्युनिष्ट अपने छुद्र स्वार्थों के चलते या अपनी बेबकूफी के चलते सावरकर के नाम से चिढ़ते रहते हैं.
Indian War of Independence 1857 की हिन्दी प्रति मेरे नानाजी ने मेरे बचपन में मुझे उपहार में दी थी. मेरे पढने के दौरान मेरा एक मित्र इसे मांग कर ले गया और मैं इसे तब से अब तक नहीं पढ सका.
भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के कार्यकाल के दौरान भारतीय पुस्तकों के डिजिटलिजेशन की शुरूआत हुई जिसमें पहले सावरकर की पुस्तकें भी शामिल थीं. पिछले दिनों जब मैंने उस डिजिटल लाइब्रेरी को खंगाला तो उसमें से सावरकर की अधिकांश पुस्तकें गायब पाईं. पहले अंग्रेजों ने उनकी पुस्तकों पर प्रतिबन्ध लगाया अब भी सावरकर की पुस्तकों पर छिपा प्रतिबन्ध लगाया जाय तो किसके लिये ये शर्म की बात है, सरकार के लिये या हमारे लिये?
खैर आप Indian War of Independence 1857 अंग्रेजी संस्करण डाउनलोड करके पड़ सकते हैं, जब तक इसका हिन्दी संस्करण न मिले
Download Indian War of Independence 1857
Read Online at Scribd
Friday, August 27, 2010
कॉमनवेल्थ खेलों का बहिष्कार करें - चेतन भगत

कॉमनवेल्थ खेलों पर घिसी-पिटी बातें करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। इस बारे में पहले ही बहुत लिखा जा चुका है। अलबत्ता इसके बावजूद हुआ कुछ नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घपला है। लूट-खसोट के बाद भी बच निकलना एक बात है, लेकिन यह हमारे देश में ही संभव है कि कोई व्यक्ति चोरी करने के बावजूद अपनी हरकतों को बदस्तूर जारी रखे। दिल्ली एक बहुत बड़ा गड्ढा बन गई है। कॉमनवेल्थ खेलों की आधिकारिक धुन या रिंगटोन कभी न खत्म होने वाली ड्रिलिंग की ध्वनि होनी चाहिए। यदि आपको यह फिक्र है कि निर्माण कार्य समय-सीमा में पूरे हो सकेंगे या नहीं, तो जरा खेल खत्म होने के बाद दिल्लीवासियों की दुर्दशा के बारे में भी सोचें। जिन सड़कों पर खुदाई कर दी गई है, उनकी कभी मरम्मत नहीं होगी। सड़कों के ये गड्ढे दिनदहाड़े हुई इस सबसे बड़ी डकैती की निशानी होंगे।
घपले उजागर होने के बाद अब दिखावे का दौर जारी है। हमारी सरकार को तो इसमें पीएचडी हासिल है। खेल पूरे होने तक जांच रिपोर्टो, बेतुके बयानों और दोषारोपण का सिलसिला चलता रहेगा। जैसे ही खेल खत्म हुए कि बात आई-गई हो जाएगी। लोग भूल जाएंगे। शानदार समापन समारोह में बॉलीवुड के सितारों का नाच होगा, जैसे कि यह मनोरंजन लूट-खसोट का हर्जाना हो। इसी दौरान ‘भारत की छवि को बचाने’ के प्रचार अभियान भी जारी रहेंगे। यह कहा जाएगा कि किसी भी तरह खेल निपट जाएं फिर देखा जाएगा। लोगों से उम्मीद की जाएगी कि वे कॉमनवेल्थ खेलों का समर्थन करें क्योंकि आखिरकार इन खेलों पर भारत की इज्जत दांव पर लगी हुई है। भारत की महान युवा शक्ति से अपील की जाएगी कि वे बड़ी तादाद में उमड़ें और स्टेडियमों को भर दें और आयोजन को ऊर्जा प्रदान करें।
लेकिन यदि हम इस आयोजन का समर्थन करते हैं, तो यह भारी गलती होगी। यह भारत के नागरिकों के लिए एक सुनहरा मौका है कि वे इस भ्रष्ट और संवेदनहीन सरकार को शर्मिदगी का अहसास कराएं। आमतौर पर भ्रष्टाचार के मामले स्थानीय होते हैं और वे पूरे देश का ध्यान नहीं खींचते। लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों के मामले में ऐसा नहीं है। यह एक ऐसा आयोजन है, जिसमें किसी एक क्षेत्र या प्रदेश विशेष की जनता नहीं, बल्कि पूरे देश की जनता ठगी गई है। यह सही समय है, जब हम भ्रष्टाचार के खेल का पर्दाफाश कर सकते हैं और इसके लिए हम वही रास्ता अख्तियार करना होगा, जो हमें बापू ने सुझाया है : असहयोग। मैं काफी सोच-समझकर ऐसा कह रहा हूं।
कॉमनवेल्थ खेलों का बहिष्कार करें। न तो खेल देखने स्टेडियम में जाएं और न ही टीवी पर देखें। हम धोखाधड़ी के खेल में चीयरलीडर की भूमिका नहीं निभा सकते। भारतीयों का पहले ही काफी शोषण किया जा चुका है। अब हमसे यह उम्मीद करना और भी ज्यादती होगी कि इस खेल में मुस्कराते हुए मदद भी करें। यदि वे संसद से वॉकआउट कर सकते हैं, तो हम भी स्टेडियमों से वॉकआउट कर सकते हैं।
कुछ लोग कह सकते हैं कि क्या हमें देश के गौरव का ख्याल रखते हुए ऐसा करना चाहिए? इससे मुझे एक छोटी सी कहानी याद आती है। जब मैं छोटा था तो हमारे पड़ोस में एक ऐसा परिवार रहता था, जिसमें पति अपनी पत्नी की बेरहमी से पिटाई किया करता था। पत्नी चोट के निशानों को छुपाने के लिए खूब मेकअप कर लेती थी। जब भी हम उनके घर जाते, तो वे दोनों इस तरह पेश आते जैसे वे दुनिया के सबसे बेहतरीन पति-पत्नी हों। वह औरत कभी-कभी पति की तारीफ भी किया करती थी। एक बार मैंने अपनी मां से पूछा कि वह ऐसा क्यों करती है? वह पति की सच्चाई को उजागर क्यों नहीं करती? मेरी मां ने कहा- क्योंकि घर की परेशानियों को इस तरह सबके सामने उजागर करना अच्छा नहीं लगता। उस औरत को अपने परिवार की इज्जत बचानी है, इसलिए झूठ बोलना उसकी मजबूरी है। धीरे-धीरे उस औरत के जख्म नासूर बनते चले गए। उसके पति की मारपीट बढ़ती रही। एक दिन यह नौबत आ गई कि पुलिस की गाड़ी और एंबुलेंस के सायरन से हमारा मोहल्ला गूंज उठा। आदमी को पुलिस पकड़कर ले गई और औरत को एंबुलेंस में लेकर जाना पड़ा।
यही हमारे देश की भी तस्वीर है। हम अन्याय और भ्रष्टाचार पर परदा डालने के लिए एक नकली चेहरा पेश करने को तैयार हैं कि हमारे यहां सब कुछ ठीक है। कॉमनवेल्थ खेलों के मामले में आयोजक उस क्रूर पति की तरह हैं और भारत की जनता उस पिटती हुई औरत की तरह। लेकिन माफ कीजिए, नए जमाने की पत्नियां अब चुपचाप पिटती नहीं रह सकतीं। कॉलेज यूनियनें, स्कूल और युवा आगे आएं और कहें कि हम इन खेलों का समर्थन नहीं करते हैं। गांधीजी ने कहा था कि अत्याचारी हम पर अत्याचार कर सकता है, लेकिन वह हमें सहयोग करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। खेलों के ब्रांड एंबेसेडर बनने वाले चेहरों को इस आयोजन से अपना नाम जोड़ने से पहले दो बार सोचना चाहिए कि क्या वे यह चाहेंगे कि भ्रष्टाचार पर परदा डालने के लिए उनकी छवि का इस्तेमाल किया जाए? मैं विदेशी मीडिया से भी अपील करना चाहूंगा कि वे सही तस्वीर पेश करें। यह भारत की जनता का कोई दोष नहीं है। यह राजनेताओं के उस गिरोह का दोष है, जो एक गरीब मुल्क की तिजोरी पर डाका डालने में जरा भी नहीं हिचकिचाया।
उन्हें इस स्थिति का उपयोग यह समझाने के लिए करना चाहिए कि आखिर क्यों हम भारतीय ओलिंपिक में पदक नहीं जीत पाते। इसकी वजह यह नहीं है कि हमारे यहां प्रतिभाएं नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि जो लोग भारत में खेल संस्थाओं पर काबिज हैं, उन्हें स्वर्ण पदक से ज्यादा परवाह इस बात की है कि अपने खीसे में चोरी का सोना कैसे ठूंसा जा सकता है।
यह सरकार पिछले साल ही चुनाव जीतकर फिर सत्ता में आई है। उसे स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ और उसके सहयोगी दलों में एकता है। यदि वे चाहते तो अगले पांच सालों में सुप्रशासन की मिसाल पेश कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने उन्हें वोट देने वाले भारतीयों को महंगाई और भ्रष्टाचार के सिवा क्या दिया? क्या इसी तरह नेता हमारे युवाओं के लिए रोल मॉडल साबित होंगे? यह विपक्षी दलों के लिए भी एक बेहतरीन मौका है, बशर्ते वे एकजुट हों। यदि वे धर्म की राजनीति में नहीं उलझते हैं और साफ छवि वाले मेहनती नेताओं को आगे लाते हैं, तो उन्हें सत्ता में वापसी करते देर नहीं लगेगी।
मौजूदा सरकार भी अगर चाहे तो अपने दाग धो सकती है, लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों का भव्य आयोजन करके नहीं। इसका एक ही तरीका है कि जो लोग भ्रष्टाचार के दोषी हैं, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। चाहे वे कितने ही रसूखदार क्यों न हों। यह एक नकली भव्य शो आयोजित करने का नहीं, भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर देने का मौका है। नहीं तो दिल्ली में जो गड्ढे खोदे गए हैं, वे ही सरकार की राजनीतिक कब्र साबित होंगे।
Thursday, August 26, 2010
गेम्स पर 28 हजार करोड़, गलत प्राथमिकता है - अज़ीम प्रेमजी

हाल ही में, केंद्रीय सरकार ने यह खुलासा किया है कि दिल्ली में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम्स पर लगभग 11,494 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। दो कारणों से, यह आंकड़ा, बेचैन करने वाला है - पहला, क्योंकि यह शुरुआती के 655 करोड़ रु. के एस्टिमेट से कई गुना ज्यादा है और दूसरा - गेम्स की असल लागत इससे भी कहीं ज्यादा होगी अगर हम इन खर्चों को भी शामिल करें, मसलन:
- - 16,560 करोड़ रुपये जो दिल्ली सरकार राजधानी के इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने में खर्च कर रही है। एक नया एयरपोर्ट टर्मिनल, चौड़ी सड़कें, नए फ्लाईओवर, मेट्रो रेल का प्रसार वगैरह।
- - मजदूरी की असल लागत - गेम्स प्रॉजेक्ट्स पर काम रहे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से कम पैसे मिलना, असुरक्षित हालात में काम करना और इंसानों के न रहने योग्य झुग्गियों में जीवन बसर करना।
कॉमनवेल्थ शब्द का असली अर्थ है जनकल्याण - ऐसे काम जो समाज की बेहतरी के लिए किए जाएं। क्या कॉमनवेल्थ गेम्स इस इम्तिहान को पास कर पाएंगे? क्या जनता की कमाई के 28 हजार करोड़ वाकई समाज की बेहतरी के लिए हैं?
मैं इसस सवाल का जवाब देने से पहले, गेम्स पर अपनी राय साफ कर दूं। सेलिब्रेशन या खुशी मनाने का भाव हम सबके ह्रदय की गहराई में बसा हुआ है। किसी आध्यात्मिक गुरु की सीख, एक राष्ट्र का उद्भव या फिर एक बच्चे का जन्म - इन सबको सेलिब्रेट करना जरूरी है, क्योंकि उन बातों की याद दिलाते हैं जो हमें सबसे ज्यादा प्रिय हैं।
किसी खिलाड़ी को अपनी शारीरिक और मानसिक सीमाओं को लांघते हुए देखना और नए कीर्तिमान स्थापित करना देखने वालों के लिए वाकई गजब का अनुभव होता है। ओलिंपिक की तरह ही कॉमनवेल्थ गेम्स, मानव की नई ऊंचाइयों को छूने के जज्बे का सेलिब्रेशन है। तो, अपनेआप में, गेम्स एक अच्छा प्रयास है।
लेकिन, दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स पर हजारों करोड़ रुपये के खर्च को देखते हुए यह सवाल उठाने की जरूरत है कि क्या यह धन सही तरीके से, समझदारी से खर्च किया जा रहा है। एक राष्ट्र के रूप में हम हमेशा धन की कमी से जूझते आए हैं। उदाहरण के लिए, भारत को बड़ी संख्या में नए स्कूलों, मौजूदा स्कूलों में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और ज्यादा टीचर रखने की जरूरत है। इसके लिए हमें जीडीपी का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करना चाहिए जबकि हम इसका आधा भी नहीं दे पाते।
इसी तरह से, देश में खेल के लिए बुनियादी ढांचे बेहद जरूरत है। खेलों को बढ़ावा देने के लिए, हमारी पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि हम यह सुनिश्चित करें कि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को खेल के मैदान तक एक्सेस मिले। उन्हें अच्छे साज-ओ-सामान और बढ़िया कोचिंग मिले। यह बुनियादी काम करने की बजाय, हम एक आयोजन पर लंबा-चौड़ा खर्च करें, तो यह साबित करता कि हमारी प्राथमिकताएं गलत हैं।
पिछले दो दशकों के दौरान हुई तेज आर्थिक तरक्की के बावजूद, सचाई यही है कि भारत एक गरीब देश है। कुछ दिनों पहले ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी ने दुनिया के अत्यधिक गरीब देशों में शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर पर एक अध्ययन करवाया। इस अध्ययन में यह बात सामने आई कि बड़े पैमाने पर, भारत अब भी गरीब देश ही है। सच तो यह है कि अफ्रीका के सबसे निर्धन 26 देशों में भी गरीबों की संख्या उतनी नहीं है, जितनी भारत में।
दिल्ली में गरीबी सबसे कम है जबकि इस स्केल के दूसरे सिरे पर - बिहार की 81 फीसदी जनता गरीबी में जी रही है। इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में एक लाख से ज्यादा मजदूर बिहार के हैं जो न्यूनतम से कम मजदूरी पर भी अपना खून-पसीना दिल्ली में आकर बहा रहे हैं।
वैसे भी देश में सबसे अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर दिल्ली में ही है। ऐसे में, राजधानी की सड़कों को चौड़ा करने पर करोड़ों रुपये खर्च करने की बजाय क्या हमें बिहार में स्कूल और सड़कें नहीं बनानी चाहिए, जहां ये चीजें हैं ही नहीं? अगर हमारे पास 500 करोड़ रुपये हों तो हमें उससे तमाम स्कूलों में बेसिक स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की बजाय क्या एक ही स्टेडियम के रेनोवेशन पर फूंक डालना चाहिए?
वास्तविक दुनिया में, यह तय करना काफी मुश्किल हो सकता है। जैसे कि, दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करना भी जरूरी है क्योंकि इस खर्च की बदौलत हमारी राष्ट्रीय इकॉनमी को बढ़ावा मिलेगा। हमारे नेताओं को लगातार भिन्न प्राथमिकताओं के बीच किसी एक को चुनना होता है। ऐसा नहीं कि यह फैसले लेने के लिए उनके पास जानकारी नहीं होता या फिर उनकी नीयत साफ नहीं होती। इस दशक के दौरान भारत सरकार ने सामाजिक कल्याण और सबके विकास के लिए नरेगा और सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं।
लेकिन, नरेगा जैसे खास कार्यक्रमों से ही बात नहीं बनेगी। बल्कि, हमारी नीतियों और स्कीमों में प्रत्येक व्यक्ति के विकास की गुंजाइश होनी चाहिए। मैं कहना चाहता हूं कि हमारी सरकारी नीतियों में यह बात साफ तौर पर सामने आनी चाहिए कि डबल डिजिट जीडीपी ग्रोथ तब तक बेमानी है जबतक यह देश के गरीब-गुरबे और सबसे पिछड़े हुए तबके का भला नहीं करती।
हम यह बात कैसे भूल सकते हैं कि 28 हजार करोड़ रुपये से हम हजारों गावों में स्कूल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बना सकते थे। क्या हम इस फिजूलखर्ची को अनदेखा कर पाएंगे जब एक भूखा और कुपोषित बच्चा हमारी आंखों में देखेगा?
ऐसे समय में, यदि हमारे नेता गांधीजी के उस गुरुमंत्र की याद करें तो अच्छा होगा - ' गांधी जी कहते हैं, मैं तुम्हें एक ताबीज देता हूं। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूं, वह क्या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्दों में, क्या यह कदम लाखों भूखों और आध्यात्मिक दरिद्रों को स्वराज देगा?'
Thursday, June 17, 2010
गैस त्रासदी मामले में मूल दस्तावेजों से हेराफेरी

गैस त्रासदी मामले में लापरवाही से हुई मौत की धारा 304ए में एफआईआर कायम की गई। यूनियन कार्बाइड के पांच अधिकारियों को गिरफ्तार भी किया गया। लेकिन दो दिन बाद जब उनमें से चार लोगों को अदालत में पेश कर रिमांड पर लिया गया तो पुलिस और अदालत दोनों के दस्तावेजों में 304ए के अलावा गैरइरादतन हत्या की धारा 304 और 278 व 429 भी थीं। सात दिसंबर को जब वारेन एंडरसन को दिए गए मुचलके पर भी इन्हीं चार धाराओं का जिक्र है।
एफआईआर बदली या धारा?:
विधि विशेषज्ञों के अनुसार रिमांड लेते समय केस डायरी और मूल एफआईआर भी अदालत में पेश की जाती हैं। अगर मूल एफआईआर धारा 304ए में दर्ज की गई तो रिमांड धारा 304 में कैसे ली गई? क्या केस डायरी में मामला गैरइरादतन हत्या का था? अगर यह मानवीय भूल थी तो एंडरसन के मुचलके में भी धारा 304 का जिक्र कैसे है? क्या मूल एफआईआर 304ए के बजाए गैरइरादतन हत्या की धारा 304 में लिखी गई थी जिसमें 10 साल तक की सजा का प्रावधान है? क्या मूल एफआईआर को बदल दिया गया? या फिर मूल एफआईआर में दर्ज एकमात्र धारा 304 को ही दो साल की सजा वाली धारा 304ए में बदल दिया गया?
क्या हुई खोजबीन?:
एक बार को मान लिया जाए कि एफआईआर तो 304ए में दर्ज हुई थी और जब पुलिस ने खोजबीन में पाया कि मामला तो गैरइरादतन हत्या का है तो इसमें अन्य गंभीर धाराएं भी जोड़ दी। लेकिन यदि ऐसा होता तो यह केस डायरी में लिखा होता और रिमांड आर्डर में भी। लेकिन यह कहीं भी नहीं लिखा गया कि इतनी गंभीर अपराध की धाराएं क्यों जोड़ी गईं और कब?
कैसे छोड़ा एंडरसन को?:
अगर मामला कमजोर किए जाने प्रयास था तो एंडरसन को कमजोर धारा के बजाए गैरइरादतन हत्या के मामले में क्यों गिरफ्तार किया गया? एक बार फिर मानवीय भूल? तो फिर गैरजमानती अपराध के मामले में उसे निजी मुचलके पर कैसे छोड़ दिया गया? जबकि उसके साथ ही गिरफ्तार केशुब महिन्द्रा और विजय गोखले को 8 दिन तक हिरासत में रहने के बाद हाईकोर्ट से जमानत लेनी पड़ी।
क्यों किया नजरअंदाज? :
भोपाल स्थित लॉ इंस्टीटच्यूट में कानून के जानकार आश्चर्य करते हैं कि पीड़ितों के ढेरों हमदर्द, इतने पुलिस अफसर, काबिल वकीलों और विद्वान न्यायाधीश इतनी कमजोरियों को 25 साल तक क्यों नजरअंदाज करते रहे?
पूर्व जिला न्यायाधीश रेणु शर्मा कहती हैं कि यदि यह सिद्ध हो जाए कि एफआईआर बदली गई तो जिम्मेदार के खिलाफ धारा 204 के तहत आपराधिक मामला बनता है। जांच में यदि मालूम चलता है कि ऐसा उच्च अफसरों के कहने पर किया गया तो उनके खिलाफ भी आपराधिक केस दर्ज होना चाहिए।
हुई है हेराफेरी?:
राज्य सरकार की विधि विशेषज्ञों की समिति के सदस्य शांतिलाल लोढ़ा मानते हैं कि इन दस्तावेजों में भारी हेराफेरी की गई हैं। उनका कहना है कि टाइपराइटर पर लिखी गई मूल एफआईआर तो गैरइरादतन हत्या की ही थी लेकिन बाद में इसमें हाथ से ए जोड़कर धारा 304ए का मामला बना दिया गया।
उनका कहना है कि न सिर्फ तत्कालीन एसएचओ बल्कि एसपी व सीबीआई के अफसरों के खिलाफ सरकारी दस्तावेजों से छेड़छाड़, अभियुक्त को बचाने, जांच को प्रभावित करने और कर्तव्य पूरा न करने की धाराएं 108, 119, 120, 201 ओर 222 के तहत केस दर्ज कर जांच आरंभ होनी चाहिए।
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साभार प्रस्तुति: कीर्ति गुप्ता का यह आलेख आज भोपाल दैनिक भास्कर के प्रथम पन्ने पर प्रकाशित हुआ है.
Wednesday, June 16, 2010
हमारे सैकड़ों भोपाल - वेदप्रताप वैदिक

भोपाल का हादसा हमारे हिंदुस्तान का सच्चा आईना है। भोपाल ने बता दिया है कि हम लोग कैसे हैं, हमारे नेता कैसे हैं, हमारी सरकारें और अदालतें कैसी हैं। कुछ भी नहीं बदला है। ढाई सौ साल पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं। गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह! अब से 264 साल पहले पांडिचेरी के फ्रांसीसी गवर्नर के चंद सिपाहियों ने कर्नाटक नवाब की 10 हजार जवानों की फौज को रौंद डाला। यूरोप के मुकाबले भारत की प्रथम पराजय का यह दौर अब भी जारी है। यूनियन कार्बाइड हो या डाउ केमिकल्स हो या परमाणु हर्जाना हो, हर मौके पर हमारे नेता गोरी चमड़ी के आगे घुटने टेक देते हैं।
आखिर इसका कारण क्या है? हमारी केंद्र और राज्य की सरकारों ने वॉरेन एंडरसन को भगाने में मदद क्यों की? कीटनाशक कारखाने को मनुष्यनाशक क्यों बनने दिया? 20 हजार मृतकों और एक लाख आहतों के लिए सिर्फ 15 हजार और पांच हजार रुपए प्रति व्यक्ति मुआवजा स्वीकार क्यों किया गया? उस कारखाने के नए मालिक डाउ केमिकल्स को शेष जहरीले कचरे को साफ करने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया गया? इन सब सवालों का जवाब एक ही है कि भारत अब भी अपनी दिमागी गुलामी से मुक्त नहीं हुआ है।
सबसे पहला सवाल तो यही है कि यूनियन कार्बाइड जैसे कारखाने भारत में लगते ही कैसे हैं? कोई भी तकनीक, कोई भी दवा, कोई भी जीवनशैली पश्चिम में चल पड़ी तो हम उसे आंख मींचकर अपना लेते हैं। हम यह क्यों नहीं सोचते कि यह नई चीज हमारे कितनी अनुकूल है। जिस कारखाने की गैस इतनी जहरीली है कि जिससे हजारों लोग मर जाएं, उससे बने कीटनाशक यदि हमारी फसलों पर छिड़के जाएंगे तो कीड़े-मकोड़े तो तुरंत मरेंगे, लेकिन क्या उससे मनुष्यों के मरने का भी अदृश्य और धीमा इंतजाम नहीं होगा?
इसी प्रकार हमारी सरकारें आजकल परमाणु ऊर्जा के पीछे हाथ धोकर पड़ी हुई हैं। वे किसी भी कीमत पर उसे भारत लाकर उससे बिजली पैदा करना चाहती हैं। बिजली पैदा करने के बाकी सभी तरीके अब बेकार लगने लगे हैं। यह बेहद खर्चीली और खतरनाक तकनीक यदि किसी दिन कुपित हो गई तो एक ही रात में सैकड़ों भोपाल हो जाएंगे। रूस के चेनरेबिल और न्यूयॉर्क के थ्रीमाइललांग आइलैंड में हुए परमाणु रिसाव तो किसी बड़ी भयावह फिल्म का एक छोटा-सा ट्रेलर भर हैं। यदि हमारी परमाणु भट्टियों में कभी रिसाव हो गया तो पता नहीं कितने शहर और गांव या प्रांत के प्रांत साफ हो जाएंगे।
इतनी भयावह तकनीकों को भारत लाने के पहले क्या हमारी तैयारी ठीक-ठाक होती है? बिल्कुल नहीं। परमाणु बिजली और जहरीले कीटनाशकों की बात जाने दें, हमारे देश में जितनी मौतें रेल और कारों से होती हैं, दुनिया में कहीं नहीं होतीं। अकेले मुंबई शहर में पिछले पांच साल में रेल दुर्घटनाओं में 20706 लोग मारे गए। भोपाल में तो उस रात सिर्फ 3800 लोग मारे गए थे और 20 हजार का आंकड़ा तो कई वर्षो का है। यदि पूरे देश पर नजर दौड़ाएं तो लगेगा कि भारत में हर साल एक न एक भोपाल होता ही रहता है। इस भोपाल का कारण कोई आसमानी-सुलतानी नहीं है, बल्कि इंसानी है।
इंसानी लापरवाही है। इसे रोकने का तगड़ा इंतजाम भारत में कहीं नहीं है। यूनियन कार्बाइड के टैंक 610 और 611 को फूटना ही है, उनमें से गैस रिसेगी ही यह पहले से पता था, फिर भी कोई सावधानी नहीं बरती गई। इस लापरवाही के लिए सिर्फ यूनियन कार्बाइड ही जिम्मेदार नहीं है, हमारी सरकारें भी पूरी तरह जिम्मेदार हैं। यूनियन कार्बाइड का कारखाना किसी देश का दूतावास नहीं है कि उसे भारत के क्षेत्राधिकार से बाहर मान लिया जाए। भोपाल की मौतों के लिए जितनी जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड है, उतनी ही भारत सरकार भी है। जैसे रेल और कार दुर्घटनाओं के कारण इस देश में कोई फांसी पर नहीं लटकता, वैसे ही वॉरेन एंडरसन भी निकल भागता है।
एंडरसन के पलायन पर जैसी शर्मनाक तू-तू-मैं-मैं हमारे यहां हो रही है, वैसी क्या किसी लोकतंत्र में होती है? अगर भारत की जगह जापान होता तो कई कलंकित नेता या उन मृत नेताओं के रिश्तेदार आत्महत्या कर लेते। हमारे यहां बेशर्मी का बोलबाला है। हमारे नेताओं को दिसंबर के उस पहले सप्ताह में तय करना था कि किसका कष्ट ज्यादा बड़ा है, एंडरसन का या लाखों भोपालियों का? उन्होंने अपने पत्ते एंडरसन के पक्ष में डाल दिए? आखिर क्यों? क्या इसलिए नहीं कि भोपाल में मरनेवालों के जीवन की कीमत कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं थी और एंडरसन गौरांग शक्ति और श्रेष्ठता का प्रतीक था।
हमारे भद्रलोक के तार अब भी पश्चिम से जुड़े हैं। दिमागी गुलामी ज्यों की त्यों बरकरार है। यदि एंडरसन गिरफ्तार हो जाता तो उसे फांसी पर चढ़ाया जाता या नहीं, लेकिन यह जरूर होता कि यूनियन कार्बाइड को 15 हजार रुपए प्रति व्यक्ति नहीं, कम से कम 15 लाख रुपए प्रति व्यक्ति मुआवजा देने के लिए मजबूर होना पड़ता। यह मुआवजा भी मामूली ही होता, क्योंकि अभी मैक्सिको की खाड़ी में जो तेल रिसाव चल रहा है, उसके कारण मरने वाले दर्जन भर लोगों को करोड़ों रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से मुआवजा मिलने वाला है। असली बात यह है कि औसत हिंदुस्तानी की जान बहुत सस्ती है।
यही हादसा भोपाल में अगर श्यामला हिल्स और दिल्ली में रायसीना हिल्स के पास हो जाता तो नक्शा ही कुछ दूसरा होता। ये नेताओं के मोहल्ले हैं। भोपाल में वह गरीब-गुरबों का मोहल्ला था। ये लोग बेजुबान और बेअसर हैं। जिंदगी में तो वे जानवरों की तरह गुजर करते हैं, मौत में भी हमने उन्हें जानवर बना दिया है।
यही हमारा लोकतंत्र है। हमारी अदालतें काफी ठीक-ठाक हैं लेकिन जब गरीब और बेजुबान का मामला हो तो उनकी निर्ममता देखने लायक होती है। सामूहिक हत्या को कार दुर्घटना जैसा रूप देने वाली हमारी सबसे बड़ी अदालत को क्या कहा जाए?
क्या ये अदालतें हमारे प्रधानमंत्रियों के हत्यारों के प्रति भी वैसी ही लापरवाही दिखा सकती थीं, जैसी कि उन्होंने 20 हजार भोपालियों की हत्या के प्रति दिखाई है? पता नहीं, हमारी सरकारों और अदालतों पर डॉलर का चाबुक कितना चला, लेकिन यह तर्क बिल्कुल बोदा है कि अमेरिकी पूंजी भारत से पलायन न कर जाए, इस डर के मारे ही हमारी सरकारों ने एंडरसन को अपना दामाद बना लिया। पता नहीं हम क्या करेंगे इस विदेशी पूंजी का?
जो विदेशी पूंजी हमारे नागरिकों को कीड़ा-मकोड़ा बनाती हो, उसे हम दूर से ही नमस्कार क्यों नहीं करते? यह ठीक है कि जो मर गए, वे लौटने वाले नहीं और यह भी साफ है कि जो भुगत रहे हैं, उन्हें कोई राहत मिलने वाली नहीं है लेकिन चिंता यही है कि हमारी सरकारें और अदालतें अब भी भावी भोपालों और भावी चेर्नोबिलों से सचेत हुई हैं या नहीं? यदि सचेत हुई होतीं तो परमाणु हर्जाने के सवाल पर हमारा ऊंट जीरा क्यों चबा रहा होता?
डा. वेद प्रताप वैदिक प्रख्यात विचारक एवं राजनैतिक विश्लेशक हैं.
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