Thursday, September 2, 2010

क्या चोरी चकारी करना हमारे विधायकों का जन्म सिद्व अधिकार है?

अगर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने न्याय किया और मध्य प्रदेश विधानसभा के अपने रिकॉर्ड पर कार्रवाई की तो प्रदेश के बहुत सारे विधायक जालसाजी के आरोप में जेल में नजर आएंगे। उन सबने फर्जी यात्रा बिल दे कर बहुत बेशर्मी से कुल मिला कर करोड़ों रुपए के यात्रा भत्ते की चोरी की है। यह खुलासा जिस अखबार ने किया है उसे विधायकों के कोप से बचने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी है।


देश में पहली बार किसी अखबार ने इतनी हिम्मत की है। हालांकि ऐसा नहीं कि लोकसभा और दूसरे राज्यों की विधानसभाओं में ऐसा होने के संकेत नहीं मिले हो लेकिन मध्य प्रदेश विधानसभा में एक अखबार ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए फर्जी यात्रा बिलों और दूसरे तरीकों से विधायकों की लाखों रुपए की चोरी पकड़ी और जवाब मांगा। निर्वाचित जनप्रतिनिधि जैसे हमेशा देश और उसके पैसे को बाप का माल समझते है वैसे ही यहां भी किया गया।


मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से प्रकाशित राज एक्सप्रेस के संपादक पर विधानसभा का विशेषाधिकार हनन करने का नोटिस थमा दिया गया। चोरी चकारी करना हमारे विधायकों का शायद जन्म सिद्व अधिकार हो और वही उनका विशेषाधिकार हो। मगर तथ्य सामने थे। एक ही विधायक एक समय में विधानसभा में भी था, अपने चुनाव क्षेत्र में भी था, दिल्ली या मुंबई में भी था और रेल, जहाज और टेक्सी से एक साथ चल रहा था। ऐसे अवतारी नेताओं के पास जवाब था नहीं और आम तौर पर क्षेत्रीय अखबार डर जाते हैं, विधायकों के दुर्भाग्य से राज एक्सप्रेस के मालिक अरुण सेहलोत और संपादक रवींद्र जैन ने बेईमानों से पंजा लड़ाने की ठान ली।


ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई अखबार पूरी विधानसभा के खिलाफ उसकी चोरियां पकड़वाने के लिए उच्च न्यायालय में गया है। अभी वह नाटक नौटंकी होनी बाकी है जिसमें यह तय किया जाएगा कि जनता के प्रतिनिधि बड़े है या अदालत का जज। न्याय प्रक्रिया और विधायिका के बीच एक नैतिक सवाल पर लड़ाई हो सकती है मगर यहां तो विधायक की हैसियत से नहीं बल्कि सरकारी पैसे के चोरों की हैसियत से इन लोगों से सवाल किया गया है और चोरों के पास जवाब कभी नहीं होता।


अरुण सेहलोत और रवींद्र जैन ने मई और जून के महीने में मध्य प्रदेश विधानसभा के कुछ विधायकों द्वारा मिले विशेषाधिकार हनन के नोटिस और इसके बाद इन नोटिसों को विशेषाधिकार समिति को भेजे जाने की सूचना जुलाई में आई। राज एक्सप्रेस ने सवाल किया है कि क्या संविधान की धारा 194 के तहत नेक इरादे से और जनहित में विधायकों द्वारा सरकारी पैसा हजम करने की खबर जनता को देना गलत है? क्या इस सूचना का विधानसभा की कार्रवाई से कोई रिश्ता है? उच्च न्यायालय में दी गई याचिका में सवाल यह भी किया गया है कि क्या विधानसभा के विशेषाधिकार नोटिस की, विधायकों की बेईमानी के साफ सरकारी प्रमाणों के बावजूद संविधान की धारा 226 के तहत समीक्षा की जा सकती है?


सवाल तो यह भी है क्या विधानसभा अपने ही रिकॉर्ड से इनकार कर सकती है और अपनी ही द्वारा दी गई सूचनाआें को गलत साबित कर सकती है? कुल मिला कर सवाल यह है कि जिन्हें हम वोट देते हैं क्या उनके कुकर्मों पर सवाल भी नहीं उठा सकते? राज एक्सप्रेस ने सीधे सवाल किया है कि आखिर विधायकों के वेतन भत्ता नियमों को किस हद तक तोड़ा गया है और यह अपराध है या नहीं? अगर यह अपराध है तो अपराधी सफाई देने की बजाय आरोप लगाने पर कैसे तुल गए? विधानसभा के अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी को भी सवाल उठता ही है और अदालत में उन्हें भी पार्टी बनाया गया है और पूछा गया है कि बजाय विधायकों के खिलाफ दिए गए सबूतों की जांच करने के उन्होंने अखबार को कैसे जारी होने दिया?

इसके अलावा नोटिस का जवाब देने के लिए जिस और रिकॉर्ड की जरूरत थी, वह देने से इनकार कर दिया गया और सीधे मामला विधायकों ने अपनी ही एक अदालत में पहुंचा दिया। विशेषाधिकार समिति के अध्यक्ष और विधायक गिरीश गौतम न्यायमूर्ति की हैसियत में जरूर है मगर अखबार में तो चोरों की सूची में उनका भी नाम लिखा है। उन्होंने भी विधानसभा से गलत और फर्जी तरीकों से भत्ते लिए हैं। अखबार ने संविधान की ही धारा 19/1 और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए जनहित में अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल उठाया है और पूछा है कि हमारे जनप्रतिनिधि किसके प्रति जवाबदेह है?

विधानसभा के अपने नियमों पर भी अगर कोई विधायक विधानसभा के आठ किलोमीटर के दायरे में रहता है तो उसे कोई यात्रा भत्ता नहीं मिलता। आखिर विधायकों को भी छह रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से मिलता हैं। यहां तो कमाल यह हुआ कि एक ही विधायक एक ही जगह से एक ही जगह की यात्रा करता है और उसके बिल में हजारों रुपए का फर्क होता है। इसे कहते है चोरी और सीनाजोरी।

अखबार को सूचना के अधिकार के तहत बताया गया कि भोपाल के लोकल विधायकों ने भी दबा कर यात्रा भत्ता वसूले है। वे एक साथ रेल, जहाज और बस से भी यात्रा करने की प्रतिभा रखते हैं तो मध्य प्रदेश इतना पिछड़ा हुआ क्यों हैं? इस प्रतिभा का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा? होना तो ये चाहिए कि जिस तरह की जानकारी मध्य प्रदेश विधानसभा के माननीय विधायकों के बारे में सार्वजनिक हुई हैं उसके बारे में संसद और देश की सभी विधानसभाओं में जांच होनी चाहिए तो यह खेल अरबों रुपए के घोटाले का हो जाएगा।

साभार : आलोक तोमर - डेटलाइन इंडिया

1 comment:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इसीलिए तो बोरे भर-भर कर तन्ख्वाह मांग रहे हैं क्योंकि थोड़े में गुज़ारा नहीं न होता है. वो दिन लद गए जब ये समाज का भला करने को राजनीति में आते थे. अब रातनीति में लोग केवल नोट छापने को ही आते हैं. फिर वो चाहे कहीं से भी छापें. ये तो बस एक बानगी भर है.