Sunday, June 13, 2010

राजनेताओं, जाच करने वालों जितने ही जिम्मेदार है माननीय जस्टिस अहमदी ...

भोपाल गैस नरसंहार के जितने राजनेता दोषी है, जितने जांच कर रहे आला अफसर दोषी है उतनी ही न्यायपालिका.

बेबस गैस पीड़ित अपने परिवार को खोकर दर दर गुहार लगाते रहे, हर दरवाजे पर सोने का जूता खाये हुये सौदागर मौजूद थे और हर दरवाजे से गैस पीड़ितों को निराशा सिर्फ निराशा हाथ लगी. प्रदेश का मुख्यमंत्री विदेशी अपराधी को अपने विमान से ससम्मान दिल्ली विदा करता है, जिले का कलक्टर उसकी कार का बाडीगार्ड बनकर हवाई अड्डे तक छोड़ने आता है. देश के आला मुन्सिफ के फैसले मुजरिमों को फायदा पहूचाते हैं.

इन गैसपीड़ितों का भाग्य भी खोटा है, अगर कोई भगवान अल्लाह या गॉड जैसी कोई हस्ती है, वह भी छिपकर किसी कोने में बैठकर इन हत्यारों की मददगार बनी हुई है.

क्यों माननीय जस्टिस अहमदी इन राजनेताओं और जांच करने वाले आला अफसरों जितने अपराधी हैं?
  • माननीय जस्टिस अहमदी के 1996 के फैसले ने अभियुक्तों की सजा कम करने का रास्ता साफ करके केस को कमजोर किया
  • आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट आरोप तय करने से गुरेज करता है फिर भी सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में माननीय जस्टिस अहमदी ने एसा किया
  • यदि आरोप ट्रायल कोर्ट में तय होते तो इस मामले में अभियुक्तों को सख्त सजा मिलने का रास्ता खुला रहता
  • माननीय जस्टिस अहमदी ने गलत बयानी की है कि इस फैसले को लेकर कोई रिव्यू पिटीशन नहीं आई. गैसपीड़ितों के ओर से दायर की गई रिव्यू पिटीशन माननीय जस्टिस अहमदी ने तुरन्त डिसमिस कर दी जिसके कि अदालती सबूत मौजूद हैं
  • अदालत में पेश न होने पर यूनियन कार्बाइड की भारत स्थित सम्पत्ति को भोपाल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट से कुर्क कर लिया लेकिन माननीय जस्टिस अहमदी ने इस सम्पत्ति को कुर्क करने के आदेश निरस्त करके इनका विक्रय करने इसकी राशि इंग्लेंड में बने भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट को भोपाल मेमोरियल हास्पीटल ट्रस्ट के रूप में भारतीयकरण करके इसके हवाले कर दिया गया. यहां भी यूनियन कार्बाइड फायदे में रहा.
  • जिस मामले में फैसले सुनाकर माननीय जस्टिस अहमदी ने यूनियन कार्बाइड को राहत दी रिटायरमेंट के बाद इसी ट्रस्ट के आजीवन ट्रस्टी के लाभ के पद पर सुशोभित हो गये, जो कि नैतिक रूप से उचित नहीं था.
  • 400 करोड़ से अधिक की विपुल धनराशि (US$87 मिलियन डालर) ट्रस्टी के विवेकाधिकार पर उपलब्ध थी.
भोपाल मेमोरियल हास्पीटल ट्रस्ट की गड़बडियों पर अधिक जानकारी के लिये आप यह पीडीएफ फाइल डाउनलोड कर सकते हैं

अपने फैसले बचाव में माननीय जस्टिस अहमदी कहते हैं कि यदि मेरा ड्राइवर कार का एक्सीडेंट कर देता है, मैं कहां से जिम्मेदार हुआ. माननीय जस्टिस अहमदी जी, यदि कोई कार के ब्रेक फेल होने पर जानबूझकर गाड़ी चलवाता है तो क्या गाड़ी चलवाने वाले की जिम्मेदारी नहीं है?

चेतावनियों और दुर्घटनाओं को अनदेखा करके भोपाल यूनियन कार्बाइड शहर के बीचोबीच जहां समाज के गरीब लोग रहते थे चलाया जा रहा था. लोग शिकायतें कर रहे थे, छोटी दुर्घटनाओं में कर्मचारी मर रहे थे, जागरूक पत्रकार किसी बड़ी दुर्घटना होने की संभावना के बारे में लिख रहे थे, चेता रहे थे, राजनेता यूनियन कार्बाइड से फायदा उठा रहे थे, प्रदेश का मुख्यमंत्री यूनियन कार्बाइड के श्यामला हिल्स पर बने गेस्ट हाउस का प्रयोग कर रहा था, राजनेताओं के रिश्तेदार यूनियन कार्बाइड में लाभ के पदों पर थे, विधानसभा में मामला उठने पर मंत्री बयान देता था कि यूनियन कार्बाईड एक डिब्बा नहीं है जिसे यहां से उठा कर दूसरी जगह रख दिया जाय.

सारे सबूत मौजूद थे और माननीय जस्टिस अहमदी ने इन लापरवाही के सबूतो को दरकिनार करते हुये यूनियन कार्बाइड को बचाने वाले फैसले दिये.

माननीय जस्टिस अहमदी जबाब दें यदि उनके पास कोई जबाब है

स्रोत: दैनिक भास्कर, विकीपीडिया, भोपाल.नेट

Saturday, June 12, 2010

ये हैं यूनियन कार्बाइड लि.द्वारा स्थापित ट्रस्ट के आजीवन चैयरमैन एवं एवं भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश ए. एम. अहमदी.



माननीय ए.एम. अहमदी 1994 से लेकर 1997 तक भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं.

भोपाल गैस नरसंहार के बाद केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने यूनियन कार्बाइड इन्डिया लि. के विरुद्द धारा 304 (II) में मुकदमा चलाने की सिफारिश की जिसमें दस साल तक की सजा का प्रावधान था लेकिन यूनियन कार्बाइड इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई

13 सितम्बर 1996 को माननीय ए.एम. अहमदी ने यूनियन कार्बाइड इन्डिया लि, के पक्ष में फैसला दे देते हुये सिर्फ धारा 304 (A) के अनर्गत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया. इस फैसले को सारी दुनियां में एक धब्बा माना जाता है और इसकी सारी दुनियां में मानवाधिकार, पर्यावरण एवं न्यायिक व संवेधानिक विशेषज्ञों ने निन्दा की.

इसी निर्देश के कारण भोपाल की अदालत भोपाल गैस नरसंहार के मुजरिमों को सिर्फ दो साल तक की सजा सुनाने को बेबस थी.

मुख्य न्यायाधीश पद से रिटायर होने के बाद माननीय ए.एम. अहमदी वर्तमान में यूनियन कार्बाइड लि. द्वारा ही स्थापित किये गये एक ट्रस्ट के आजीवन चैयरमैन पद पर सुशोभित हैं.


आईये 25 सालो की पीड़ा भूलकर एक पुराना गीत सुनें

देखो देखो देखो.
पैसे पर बिकता है कोर्ट देखो
कैसे ? ये डंके की चोट देखो
मुन्सिफ ही मु़ज़रिम का हामी बना
किस किस ने लूटा खसोट देखो
पैसा फैंको, तमाशा देखो.

देखो ये है उनका, हंसता गाता बन्दर
एक एक टुकड़े पर, नाच दिखाता बन्दर
दायें बायें बन्दर, नीचे ऊपर बन्दर
देख रहे भोपाली, हर कुर्सी पर बन्दर

बिगड़ी व्यवस्था की चाल देखो
किससे कहें अपना हाल देखो
हर एक डाली पे उल्लू जमा
जीना हुआ है मुहाल देखो
पैसा फैंको, तमाशा देखो.

सुनते हैं कि ये गाना दुश्मन फिल्म का हिस्सा था जिसे बाद में फिल्म से हटा दिया गया

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Friday, June 11, 2010

क्या सिर्फ अर्जुन सिंह ने किए थे सारे फैसले? -आलोक तोमर


भोपाल के हजारों अभागे गैस पीड़ितों का कानूनी श्राद्ध पूरा हो पाता उसके पहले राजनैतिक कपाल क्रियाएं शुरू हो गई है। अब यह सबको मालूम है कि अर्जुन सिंह ने यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन को सरकारी मेहमान की तरह बाइज्जत गिरफ्तार कर के तीन घंटे में जमानत दे कर अपने जहाज से दिल्ली विदा कर दिया था। यह भी लगभग जाहिर है कि अर्जुन सिंह हो या कोई भी दूसरा कांग्रेसी मुख्यमंत्री, इतना बड़ा फैसला सिर्फ अपने दम पर नहीं कर सकता।

खबर आई है कि अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह की चुरहट लॉटरी न्यास में यूनियन कार्बाइड ने तीन करोड़ रुपए का दान दिया था। सबसे पहले तो यह कि अर्जुन सिंह अपने किए की वजह से कभी आफत में नहीं पड़े। पता नहीं राजनैतिक साजिश थी या कुछ और उनके पिता को दिल्ली में रिश्वत लेने के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया था और जेल में ही उनका निधन हुआ। चुरहट लॉटरी बेटे सिंह का कारनामा था जिसमें एक सरकारी अधिकारी निगम साहब का दिमाग भी चला था और बताया गया कि इस लॉटरी में सब कुछ फर्जी था। आपस में ही इनाम बांट लिए गए और फिर न्यास धरा रह गया।

चुरहट को ले कर अर्जुन सिंह बहुत लंबे समय तक आफत में फंसे रहे थे। एक बार तो उन्हें सर्वोच्च न्यायालय से प्रतिकूल टिप्पणी आने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था। मगर अदालत की ही दूसरी टिप्पणी के बाद वे फिर अपने पद पर विराज गए। इसके बाद आज अर्जुन सिंह को कांग्रेस के हाशिए पर धकेला गया है तो इसके पीछे उनकी पुत्री बीना सिंह की राजनैतिक महात्वकांक्षा है कि वे पिछले लोकसभा चुनाव में सतना से कांग्रेसी उम्मीदवार के खिलाफ लड़ गई। कांग्रेस का उम्मीदवार हार गया।

मगर बात भोपाल हादसे की हो रही है। वारेन एंडरसन जब दिल्ली आया तो भी भारत सरकार का अपराधी था। उसे गिरफ्तार करने की बजाय होटल अशोक में प्रेसीडेंशियल सुईट में रखा गया जिसका किराया 26 साल पहले भी 12 हजार रुपए रोज होता था। राजीव गांधी ने फोन पर एंडरसन से बात भी की। मानना पड़ेगा कि राजीव गांधी ने एंडरसन को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर दिया था। उन्होंने कहा था कि भोपाल में यूनियन कार्बाइड संयंत्र की रचना में कुछ तकनीकी गड़बड़िया थी जिसकी वजह से यह हादसा हुआ। एंडरसन ने तो सरेआम बयान दे कर कह दिया था कि भारतीय कर्मचारियों की गलती की वजह से यह हादसा हुआ है। इसके बाद एंडरसन किसकी मेहरबानी से वापस जाने में कामयाब हुआ, यह सवाल अब भी बाकी है।

आप गौर करें तो पाएंगे कि जो आधी अधूरी सजा भोपाल की अदालत ने दी हैं वह सब भारतीय अभियुक्तों के खिलाफ हैं। केशव महिंद्रा जरूर यूनियन कार्बाइड इंडिया के चेयरमैन थे मगर 2002 में भारतीय उद्योग जगत की निस्वार्थ सेवा करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित करने का फैसला किया था। खुद केशव महिंद्रा ने यह सम्मान वापस कर दिया था और कहा था कि जब तक मैं भोपाल के मामले में कलंक मुक्त नहीं हो जाता तब तक मुझे यह सम्मान लेने का कोई हक नहीं हैं। क्या वाजपेयी सरकार को भी पता नहीं था कि केशव महिंद्रा इतने बडे़ नरसंहार में मुख्य अभियुक्त हैं?

अब अर्जुन सिंह पर लौट कर आइए। उनके पुराने राजनैतिक शिष्य और कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ महासचिव दिग्विजय सिंह जो खुद भी मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, कह रहे हैं कि अमेरिकी दबाव में केंद्र सरकार को यह फैसला लेना पड़ा होगा। जाहिर है कि वे राजीव गांधी को अनाड़ी और दबाव के सामने झुक जाने वाला मानते हैं। राजीव गांधी की सरकार में आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा अरुण नेहरू के पास था और हर सरकारी फैसले में अरुण सिंह की बड़ी भूमिका होती थी, ये दोनों हमारे बीच मौजूद हैं और इनसे सवाल कोई नहीं कर रहा।

कायदे से अर्जुन सिंह के पास दिल्ली से नरसिंह राव या जिस किसी का फोन एंडरसन को छोड़ने और दिल्ली भेजने के लिए आया था, उसे खुद अर्जुन सिंह को समझाना चाहिए था कि मामला कितना गंभीर हैं और इसके मुख्य अभियुक्त को यों ही छोड़ देने के कितने भयानक परिणाम निकलेंगे? मध्य प्रदेश के सरकारी जहाज के पायलट तक कह रहे हैं कि उन्हें अगर पता होता कि उनके जहाज में एंडरसन को दिल्ली छोड़ा जाना है तो वे नौकरी छोड़ देते मगर ऐसा पाप नहीं करते।

सत्यव्रत चतुर्वेदी गलत समय पर गलत बात बोलने के लिए कुख्यात हैं और उन्हांनें तो सीधे कह दिया कि दिल्ली से कोई संदेश नहीं गया और जो फैसला हुआ वह अर्जुन सिंह ने ही किया था। दिग्विजय सिंह जो कह रहे हैं वह असल में राजीव गांधी पर सारी जिम्मेदारी मढ़ने जैसा आरोप है। मगर दिग्विजय सिंह भी तर्क की सीमा के बाहर नहीं जा रहे हैं। वे कहते है कि मैं उस समय भोपाल में नहीं था इसलिए मुझे पूरी जानकारी नहीं हैं मगर इस तर्क में भी एक पेंच है। दस साल तक मुख्ममंत्री रहने के बाद अगर कोई यह दावा करे कि उसे राज्य के ही नहीं, विश्व के इतिहास की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के तथ्य नहीं पता तो यह बात आसानी से हजम होने वाली नहीं है।

भारत के एटॉर्नी जनरल की हैसियत से सोली सोराबजी ने राय दी थी कि धारा 304 के तहत एंडरसन के प्रत्यर्पण के पूरे आधार मौजूद हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को जिसमें राम जेठमलानी जैसे महान वकील कानून मंत्री थे, इस मामले में राय लेने के लिए अमेरिका की ही एक कानूनी कंपनी मिली। इस कंपनी ने मोटी फीस ली और कह दिया कि जो आधार बताए गए हैं उन्हें देखते हुए तो एंडरसन का प्रत्यर्पण नहीं हो सकता। इस राय का मूल तत्व यह था कि एंडरसन अमेरिका में बैठे थे और भोपाल में दिन प्रतिदिन क्या हो रहा है इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। इसी तर्क के आधार पर यह भी कहा जा सकता हेै कि भारत सरकार तो दिल्ली में बैठी थी और भोपाल में क्या हो रहा है उसे क्या पता।

इस कहानी का कोई अंत नहीं हैं। सारे अभियुक्त अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में हैं। एंडरसन नब्बे का होने जा रहा है। केशव महिंद्रा 85 पार कर चुके हैं। शिवराज सिंह या पी चिदंबरम इस मामले को फिर अदालत में ले जाएंगे और फिर फास्ट ट्रैक अदालतों ने मामला चले तो भी चार पांच साल से पहले तक नहीं होने वाला और एंडरसन और बाकी अभियुक्त कोई अमृत खा कर नहीं आए हैं जो इस पूरे मुकदमे के अंत तक दुनिया में बने ही रहेंगे। उनकी मृत्यु के साथ भोपाल के इस नाटक का अंत नहीं होने वाला।

बहुत से बहुत हम यह सबक सीख सकते हैं कि कोई भोपाल फिर से घटित नहीं हो पाए और अगर हो जाए तो न्याय के लिए 26 साल तक इंतजार नहीं करना पड़े।

श्री आलोक तोमर प्रखर जुझारू पत्रकार हैं इन्हें आप जनादेश पर पढ सकते हैं

Tuesday, December 1, 2009

बाबरी और राव का अंतिम सच


जस्टिस लिब्रहान ने जिन एक हजार पन्नों पर अपनी रपट लिखी है, वे बर्बाद हो गए। उन्हीं एक हजार पन्नों पर यदि छोटे बच्चों को क ख ग पढ़ाया जाता तो उनका कुछ बेहतर इस्तेमाल होता।

यह कैसी रपट है कि बाबरी मस्जिद तोड़नेवाले एक भी कारसेवक पर वह उंगली नहीं रख सकी। वह उस साजिश का पर्दाफाश भी नहीं कर सकी, जिसके तहत मस्जिद गिराई गई लेकिन इस रपट के बहाने देष में जबर्दस्त राजनीतिक लीपा-पोती चल रही है। स्वयं लिब्रहान ने श्री नरसिंह राव पर व्यंग्य-बाण कसे हैं।

इस लीपा-पोती का सबसे दुखद पहलू यह है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। कोई कह रहा है कि 6 दिसंबर 1992 को वे दिन भर सोते रहे। कोई कह रहा है कि राव और संघ की मिलीभगत थी और मुझे उध्दृत करके यह भी कहा जा रहा है कि राव साहब ने मुझे कहा कि ''चलो अच्छा हुआ, मस्जिद टूटी, पिंड कटा।'' ये तीनों बातें बिल्कुल निराधार हैं।

6 दिसंबर 1992 को रविवार था। उसी दिन मस्जिद टूटी थी। उस दिन सुबह साढ़े आठ बजे से रात साढ़े ग्यारह बजे के बीच राव साहब से मेरी कम से कम छह-सात बार बात हुई है। रविवार होने के बावजूद मैं सुबह ठीक आठ बजे अपने दफ्तर (पी.टी.आई.) पहुंच गया था। साढ़े आठ बजे के आस-पास उनसे रोजमर्रा की तरह सामान्य बातचीत हुई। सवा दस बजे के करीब मैंने उन्हें बताया कि मस्जिद के पहले डोम पर लोग चढ़ गए हैं। हम दोनों की बातचीत के बीच आईबी प्रमुख वैद्य ने उन्हें ''रेक्स'' (लाल फोन) पर इसकी पुष्टि की ! राव साहब ने मुझसे कहा कि ''यह तो भयंकर धोखा हुआ।'' ''इन लोगों'' ने आपसे और मुझसे जितने भी वायदे किए थे, सब भंग कर दिए। राव साहब के प्रतिनिधि के तौर पर मैं विहिप, संघ, भाजपा नेताओं, साधु-संतों और मुस्लिम नेताओं से मंदिर-मस्जिद विवाद पर लगभग साल भर से बातचीत चला रहा था। औपचारिक तौर पर यह बातचीत शरद पवार, सुबोधकांत सहाय, कुमारमंगलम और राजेश पायलट चलाते थे।

राम-मंदिर आंदोलन के सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि उन्हें कार सेवा करने दी जाए। राव साहब कार-सेवा की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे। बातचीत टूटनेवाली थी लेकिन विहिप नेताओं ने मेरे आग्रह पर कार-सेवा की तारीख तीन माह आगे बढ़ाई और छह दिसंबर की तिथि तय हुई। यह समझौता 24 जुलाई को हुआ। इसी बीच प्रधानमंत्री ने राम-मंदिर आंदोलन का समाधान निकालने के लिए क्या-क्या प्रयत्न नहीं किए। इन सबका उल्लेख यहां नहीं हो सकता। 3 दिसंबर को मुख्यमंत्री कल्याणसिंह ने मुझे फोन किया और लगभग एक घंटे बात की। सर संघचालक रज्जू भय्या, सुदर्षनजी, अषोक सिंघलजी, डालमियाजी, आडवाणीजी, अटलजी, विनय कटियार आदि से भी स्पष्ट बात हुई। समझौता यह हुआ कि ढांचे के पास कोई नहीं जाएगा। केवल चबूतरे पर कार-सेवा होगी। कोई तोड़-फोड़ या ंहिंसा नहीं होगी। ऐसा ही आष्वासन उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय एकात्मता समिति को भी दिया गया था। लेकिन मुझे काफी शक था, क्योंकि बेकाबू होती भीड़ के कई कड़ुए अनुभव मुझे अपने छात्र-काल में हो चुके थे। मैंने कुछ रक्षा-विषेषज्ञों से बात करके प्रधानमंत्री को सलाह दी थी कि वे रबर-बुलैटों का अग्रिम प्रबंध करें ताकि हिंसक कार सेवकों को घायल किए बिना घटना स्थल से भगाया जा सके। मैंने उनसे यह भी कहा था कि छह दिसंबर के दिन मस्जिद को चारों तरफ से टैंकों से घिरवा दिया जाए।


ज्यों-ज्यों मस्जिद के दूसरे डोमों के गिरने की खबर आती गई, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री शंकरराव चव्हाण, अन्य वरिष्ठ अफसर और मैं कई विकल्पों पर विचार करते रहे। फैजाबाद स्थित पुलिस बल को अयोध्या दौड़ाने, कल्याणसिंह को बर्खास्त करने, ढांचे को बचाने, कार-सेवकों को विसर्जित करने आदि का कोई भी निर्णय लागू नहीं हो सका, क्योंकि हर निर्णय में कानूनी अड़चनें थीं और उससे भी ज्यादा आषंका यह थी कि यदि घटना-स्थल पर रक्तपात हो गया तो उसकी आग सारे देष में फैल जाएगी। कोढ़ में खाज क्यों पैदा करना ? मैं स्वयं उस समय तत्काल कठोर कार्रवाई के पक्ष में था लेकिन अब 17 साल बाद सोचता हूं तो लगता है कि राव साहब ने असाधारण धैर्य का परिचय देकर ठीक किया। लगभग चार बजे राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने मुझसे फोन पर पूछा कि ''क्या करें, मुख्यमंत्री राजभवन के गेट पर खड़े हैं ?'' मैंने कहा, 'वही कीजिए, जो गृहमंत्री कहते हैं।'' इस बारे में प्रधानमंत्री से आधा-एक घंटा पहले मेरी बात हो चुकी थी। याद रहे, राव साहब अक्सर पौने तीन बजे लंच के बाद आधा घंटा विश्राम किया करते थे। उस दिन उन्होंने न तो भोजन किया और न ही विश्राम। दूसरे दिन उन्हें तेज बुखार हो गया और गला इतना खराब रहा कि वे फोन पर ठीक से बात भी नहीं कर पा रहे थे। उस रोज मैंने खुद रात को साढ़े ग्यारह बजे वित्त राज्यमंत्री श्री रामेष्वर ठाकुर के घर भोजन किया। उस दिन देष के अनेक प्रमुख नेताओं से दिन-भर फोन पर बात होती रही। पता नहीं क्यों, संघ और कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने प्रधानमंत्री के विरूध्द तलवारें खींच लीं। उन्हें बदनाम करने और अपदस्थ करने के लिए क्या-क्या षडयंत्र नहीं किए गए ? राव साहब के एक वरिष्ठ मंत्री ने मुझे भी धमकी दी। जब मैं ठाकुरजी के घर भोजन कर रहा था तो उन्होंने कहा ''आपको और आपके मित्र राव साहब को अब हम देख लेंगे।'' हुआ क्या ? वे खुद ही बाहर हो गए और राव साहब पूरे पांच साल सरकार चलाते रहे। संघ के लोग कहते रहे कि नरसिंहराव से बड़ा शातिर कौन हो सकता है ? उन्होंने बाबरी ढांचा जान-बूझकर टूटने दिया ताकि संघ और मंदिर-आंदोलन हमेषा के लिए बदनाम हो जाएं। इस बहाने उन्होंने भाजपा की राज्य-सरकारें भी भंग कर दीं। श्री नरसिंहराव पर मस्जिद तुड़वाने का आरोप वैसा ही है, जैसा यह कहना कि न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर अमेरिका के यहूदियों ने गिरवाए या बेनज़ीर भुट्टों की हत्या आसिफ ज़रदारी ने करवाई! अफसोस इस बात का है कि ऐसी बे-सिरपैर की बातों को कांग्रेस के कुछ जिम्मेदार नेताओं ने भी प्रोत्साहित किया, खासतौर से राव साहब के पद से हटने के बाद। वे यह भूल गए कि उनकी यह कृतघ्नता राव साहब से ज्यादा खुद कांग्रेस को बहुत मंहगी पड़ेगी। आष्चर्य है कि आज की कांग्रेस भी राव साहब की भूमिका पर हकला रही है। नरसिंहरावजी की नीयत पर शक करना अपने महान लोकतंत्र की इज्जत को खटाई में डालना है।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
(लेखक, प्रधानमंत्री नरसिंहराव के अभिन्न मित्र रहे हैं)

Wednesday, June 24, 2009

माओवादियों का लाल आतंक देश के लिये गंभीर खतरा है


वोट बैंक की राजनीति के कारण जब पश्चिम बंगाल सरकार ने माओवादियों के सामने एक तरह से समर्पण ही कर दिया, तब वह केंद्रीय बलों को वहां हालात संभालने के लिए बुलाने को बाध्य हुई, ताकि उसकी कुछ तो विश्वसनीयता कायम रह सके। बेशक, माओवाद की समस्या से केंद्र सरकार द्वारा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) पर सिर्फ प्रतिबंध लगाने से नहीं निपटा जा सकता। पर सवाल यह है कि जब दशकों से पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन रहा है, तो उसके नेताओं ने वे कड़े फैसले क्यों नहीं किए जिनसे माओवाद से सबसे बेहतर ढंग से निपटा जा सकता था। अगर कड़े उपायों की जगह राजनीतिक प्रयासों से समस्या सुलझाई जा सकती थी, तो ऐसा पहले ही किया जाना चाहिए था। अब केंद्र के उपायों के खिलाफ बयानबाजी करके लोगों को भरमाने से बाज आना चाहिए। ये बातें सिर्फ लालगढ़ या पश्चिम बंगाल पर ही लागू नहीं होतीं, बल्कि झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि उन राज्य सरकारों पर भी लागू होती हैं, जो नक्सल समस्या से प्रभावित हैं। राज्य सरकारों को इस बारे में दोहरा रवैया अपनाने और देखो व इंतजार करो की नीति से भी दूर रहने की जरूरत है। मोटे तौर पर देश की एकता-अखंडता को प्रभावित करने वाले मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।


उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने नक्सली हिंसा को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। हाल की नक्सली कार्रवाइयों को देखते हुए यह बात एकदम सही लगती है। हालांकि इस आंदोलन की शुरुआत के साथ ही तत्कालीन सरकार ने इसके खतरों को भांप लिया था। 70 के दशक में सरकार ने अभियान चलाकर नक्सलियों की कमर तोड़ दी थी, उसके बाद वे छोटे-छोटे गुटों में बिखर गए। इनमें पीपल्स वार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर प्रमुख थे। वर्ष 2004 में इनका आपस में विलय हो गया और इन्होंने मिलकर सीपीआई (माओवादी) का गठन किया। ये गरीबों और आदिवासियों की मदद करने की आड़ में राज्य सत्ता को लगातार चुनौती दे रहे हैं। वे खास तौर से पुलिस और सुरक्षाबलों को निशाना बनाते रहे हैं। इस साल मई तक 162 सुरक्षाकर्मियों की मौत नक्सली हमले में हो चुकी है। पिछले साल नक्सली हमले में 231 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी।

नक्सलवाद या माओवाद के बढ़ते खतरे के बावजूद नक्सलियों से निपटने की स्पष्ट नीति का अभाव नजर आता रहा है। इस मामले में हर राजनीतिक दल अपना अलग-अलग राग अलापता रहा है। चुनाव के समय सियासी पार्टियां किसी से भी सहयोग लेने से नहीं हिचकतीं। वोट के लिए वे माओवादियों से भी हाथ मिलाने को तैयार रहती हैं। नक्सली हिंसा से निपटने में देश के वर्तमान कानून काम नहीं आ रहे। ये कानून न सिर्फ अपर्याप्त हैं बल्कि उन्हें अमल में लाना भी संभव नहीं है। वास्तव में आज कोई कारगर कानून ही नहीं है, जो नक्सली हिंसा से निपट सके।


कानून बनाते समय तात्कालिक परिस्थितियों का ही ध्यान रखा जाता है, भविष्य पर नजर नहीं रहती। आज के कई कानून 1863 में बने हुए हैं। उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन देश के सामने नक्सली हिंसा का इतना भयावह संकट पैदा होगा और वे कुछ क्षेत्रों में सरकार के समानांतर अपनी सत्ता भी कायम कर लेंगे।

नक्सली हिंसा के मामले में कानूनी कार्रवाई तभी संभव है, जब उनकी हिंसा के कुछ प्रत्यक्षदर्शी सामने आएं। पर फिलहाल तो ऐसे गवाहों का मिलना असंभव है, जो कोर्ट के सामने आकर सारी बात बताएं और लंबे समय तक निरंतर मुकदमे की कार्यवाही में सहयोग करते रहें।


देश में एक तबका ऐसा भी है जो कहता है कि नक्सली हिंसा को ध्यान में रखकर कानून बनाने से भी इस पर रोक नहीं लग पाएगी। यह तर्क अमर्यादित और बचकाना है। देश में डकैती, बलात्कार, दहेज हत्या और रैश ड्राइविंग को रोकने के लिए कानून बने हुए हैं फिर भी इन पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि इन अपराधों के विरुद्ध कानून न बनाए जाएं। समस्या असल में दूसरी है, वह यह है कि कानून निर्माताओं को जमीनी हकीकत का अहसास नहीं है। यही नहीं, जब भी सख्त कानून बनाने की बात चलती है, मानवाधिकार उल्लंघन का हौवा खड़ा कर दिया जाता है, नतीजतन कानून को अत्यधिक लचीला या हल्का-फुल्का बना दिया जाता है और इस तरह उसकी कोई खास उपयोगिता नहीं रह जाती।

केंद्र सरकार कहती है कि नक्सलियों से लड़ना राज्य सरकार की जवाबदेही है जिनके पास न तो पैसा है, न उन्नत हथियार, न ही प्रशिक्षित पुलिस बल और सक्षम खुफिया तंत्र। नक्सलियों ने पुलिस से लूटे गए हथियारों के बल पर एक गुरिल्ला युद्ध छेड़ रखा है। हमारे सुरक्षा बल जान की बाजी लगाकर उनका सामना कर रहे हैं लेकिन कई बार उन्हें ही आलोचना और बदनामी झेलनी पड़ती है। नक्सलियों से लड़ता हुआ कोई पुलिसकर्मी मारा जाता है तो कोई उसके लिए आंसू तक नहीं बहाता बल्कि ऐसी घटनाओं को परोक्ष रूप से जायज ठहराते हुए कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी बयान देते हैं कि यह हिंसा गरीबी और बेरोजगारी की देन है या यह कृषि संकट की देन है। इस बात से किसे इनकार होगा कि देश में गरीबी और बेरोजगारी की स्थिति बेहद खतरनाक है। लेकिन गौर करने की बात है कि नक्सलवाद जैसे आंदोलन के कारण ही ये समस्याएं दूर नहीं हो पा रही हैं। आखिर उन इलाकों में कौन निवेश करेगा, कैसे वहां सड़कें और पुल बन पाएंगे, जहां नक्सलियों के आंदोलन के कारण अशांति और असुरक्षा बनी रहती है?

नई केंद्र सरकार ने अपने पहले सौ दिनों के लक्ष्य में नक्सल आंदोलन से निपटने की योजनाओं को भी शामिल किया है। सरकार ने एक मल्ट एजेंसी सेंटर बनाने का फैसला किया है जो चौबीसों घंटे काम करेगा और आतंक की तमाम घटनाओं से जुड़ी सूचनाओं को एकत्रित तथा प्रसारित करेगा। सरकार एक नैशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर भी बनाना चाहती है जिसके जरिए समस्त सूचनाओं का संयोजन संभव होगा। देखना है कि इन संस्थानों के गठन से नक्सली हिंसा के खिलाफ लड़ने में कितनी मदद मिलती है।


इस लेख के लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक सरदार जोगिन्दर सिंह हैं

Sunday, February 1, 2009

कार्टून : बरखा दत्त कर रहीं हैं रिपोर्टिंग एनडीटीवी के लिये


एनडीटीवी द्वारा एक ब्लागर के प्रति की गई ज्यादती पर मुझे ईमेल द्वारा यह कार्टून मिला है, आप भी मुलाहजा फरमाईये.


अधिक जानकारी के लिये निम्न पोस्ट देखिये


Wednesday, December 3, 2008

मुशर्रफ ने पाकिस्तानी सरकार को आतंकवाद पर लगाम न लगाने के लिये डांटा

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने मुंबई में आतंकवादी हमलों के परिप्रेक्ष्य में भारत के साथ संबंधों में तनाव के लिए पाकिस्तान की मौजूदा सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि आतंकवाद से लड़ने के लिए सरकार कितनी सख्त है.

भूतपूर्व सदर मुशर्रफ ने लंदन में एक इंटरव्यू में कहा कि "यदि आप आतंकवाद से नहीं लड़ते और सभी को इस बात का एहसास नहीं कराते कि आप इसे लेकर कितने सख्त हैं, तो आपको अमेरिका जैसे अन्य देशों और भारत के साथ इस तरह के हालात में समस्या हो सकती है. मुशर्रफ ने कहा कि सरकार के रुख के कारण भारत के साथ हालात जटिल हो गए हैं"

मुशर्रफ ने कहा कि पाकिस्तान में जिस तरह की हिंसा अब देखी गई है, मेरे समय में कभी भी नहीं हुई. 'द न्यूज' में प्रकाशित इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जल्दी ही विचार कर लिया था कि आतंकवाद के खिलाफ मैं अमेरिका के साथ हूं. आतंकवादियों और चरमपंथियों को रोकने के लिए मैंने अपने सभी अधिकारों का इस्तेमाल किया. मुशर्रफ ने कहा कि आतंकवादियों से निपटने का एक ही रास्ता है -उनसे लड़ना.

सेना मेरी हिफाजत कर रही है, लेकिन कुछ भी संभव है. पाकिस्तान बहुत बुरी स्थिति में है. मैं विदेशी निवेश लाया. मैंने सड़कें बनवाईं. उन्होंने कहा कि वह पाकिस्तान में रहना चाहते हैं उन्होंने कहा कि पाकिस्तान मेरा घर है और मैं उसे नहीं छोड़ूंगा, हालांकि मुझे पाकिस्तान में खतरा हो सकता है.

केवल मुशर्रफ ही नहीं पाकिस्तान की आम जनता पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को पोषित किये जाने पर रोष जता रही है और जनता का रुख भांपकर पाकिस्तानी सरकार और आईएसआई अपने धंधेबाज चैनलों के जरिये अपने आपको पाक साफ साबित करने की मुहिम चलाने और इसे भारत द्वारा षड़यंत्र बताने की तैयारी करने लगी है.